गुरुवार, 1 सितंबर 2011
मन रे गा .......
छः सालों के बाद आज इसकी उपलब्धियों और नाकामियों का आकलन करते हैं तो निराशा ही हाथ लगती है. यह योजना भ्रष्टाचार रूपी राक्षस का आहार बन कर रह गयी है. आज पंचायत प्रतिनिधियों के कमाई का मुख्य जरीया मनरेगा ही है.
इस योजना में व्याप्त अनियमितता का ज्वलंत प्रमाण औरंगाबाद जिले के दाउदनगर प्रखंड में तत्कालीन प्रखंड प्रमुख से योजना की प्रशासनिक स्वीकृति हेतु प्रखंड कार्यक्रम पदाधिकारी श्री आशीष कृष्ण द्वारा घूस के रूप में बीस हजार रूपए लेते निगरानी द्वारा पकड़ा जाना है. इतना ही नहीं मनरेगा में प्रखंड स्तर पर सहायक के रूप में कार्यरत रतन कुमार भी दो हजार रूपए घूस लेते पकडे गए. साफ तौर पर जाहिर है कि जब प्रखंड प्रमुख से रूपए की वसूली हो सकती है तो आम प्रतिनिधियों की क्या बिसात. पर, मामले की तह में जाने पर पता चलता है कि पंचायत प्रतिनिधियों से पदाधिकारी वसूली इसलिए कर पाते हैं कि वे धरातल पर एक लाख रूपए का काम चार से पांच हजार रूपए में निबटा देते हैं.
कहीं कहीं तो धरातल पर बिना एक रूपए का काम किए पैसे की निकासी कर ली गयी है. ऐसा ही एक मामला दाउदनगर प्रखंड अंतर्गत ही अरई पंचायत का है, जिसकी शिकायत ग्रामीणों द्वारा मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव तथा अन्य वरीय पदाधिकारियों तक से की गयी है. इसी गाँव के मुकेश पाण्डेय उर्फ नन्हे पाण्डेय ने बताया कि “ग्राम अरई में मेन रोड से महगु साव तक ईट सोलिग एवं नाली निर्माण (0505002002/RC/03/2009-10)” मद में मुखिया और सम्बंधित अधिकारी/कर्मचारी ने बयासी हजार नौ सौ सात रूपए बत्तीस पैसे (INR 82907.32) की निकासी बिना कोई काम कराए कर ली. भांडा फूटने पर मुखिया और पंचायत रोजगार सेवक ने थोथी दलील देनी शुरू कर दी कि इस पैसे से किसी दुसरे जगह काम करा दिया गया है, जबकि मनरेगा में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि प्रस्तावित स्थल से इतर अथवा अन्य किसी कार्य में उनका उपयोग किया जाए. मनरेगा पदाधिकारियों द्वारा दी गयी सूचना और इसके आधिकारिक वेबसाईट पर दर्ज ब्योरा भी निर्लजता से पैसे के गबन की कहानी कहते हैं. सरकारी जांच जारी है (!!!).
मनरेगा में जॉब कार्ड धारियों के खाते में भुगतान की व्यवस्था की गयी, पर भ्रष्टाचारी तो तू डाल-डाल मैं पात-पात के तर्ज पर, अपने चहेतों का (जो आर्थिक दृष्टि से संपन्न होते हैं और मजदूरी नहीं करते) जॉब कार्ड खोलवाते हैं, जाली मस्टर रौल तैयार करते हैं और उनके खाते के माध्यम से भुगतान प्राप्त करते हैं. कार्यस्थल पर परियोजना के अनुमानित लागत के साथ कार्य संख्या इत्यादि का विवरण देते हुए नियमानुसार नागरिक सूचना पट (Public Information Board) गाड़नी होती है पर इसका बिल्कुल ही पालन नहीं किया जाता. काम शुरु करने से पहले Public Information Board (मनरेगा के नियमानुसार) गाड़ना जरुरी है, जिससे स्थानीय नागरिक हो रहे कार्य के बारे में जान सकें तथा अगर कोई खामी बरती जा रही हो तो वे समझ सकें । एक तरह से Board गाड़ देने से सोशल ऑडिट सवयंमेव होते रहता है । लोग बोर्ड देखते हैं फिर कार्य की गुणवत्ता. मनरेगा एक ऐसी योजना है जिसमें पब्लिक को सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट) का अधिकार है, पर जानकारी एवं जागरूकता के अभाव के कारण लोग अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाते.
ऐसा भी नहीं, कि योजना में बरती जा रही अनियमितताओं की खबर सरकार को नहीं है. जनवरी 2007 से मार्च 2011 तक ग्रामीण विकास विभाग, भारत सरकार को केवल बिहार से 105 शिकायतें मिल चुकी हैं. इनमें से कुछ शिकायत तो अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों द्वारा दर्ज हैं, जो आज भी भारत सरकार तथा बिहार सरकार में मंत्री हैं. पर, इन सभी शिकायतों पर केन्द्र सरकार द्वारा बार-बार रिमाइन्डर मिलने के बावजूद राज्य सरकार द्वारा दोषियों पर कार्रवाई की बात तो दूर कोई जाँच प्रतिवेदन तक नहीं भेजा गया, जो निराशाजनक है.
हर पंचायत में अमूमन दस से बीस लाख रुपए प्रत्येक वर्ष मनरेगा में खर्च हो रहे हैं, लेकिन वास्तव में धरातल पर बीस प्रतिशत राशि का भी व्यय नहीं हो पा रहा। चर्चा होती है कि बिहार में निवेश नहीं हुआ, फैक्ट्री नहीं लगी, मजदूरों का पलायन अन्य प्रदेशों में हो रहा है। और तो और महाराष्ट्र, गुजरात, आसाम सब जगह बिहारी मजदूर पीटे जा रहे हैं। निवेश नहीं हुआ तो नहीं हुआ, मनरेगा को तो ईमानदारी से कार्यान्वित करा दीजिए। जो काम बिहार सरकार के हाथ में है उसका कार्यान्वयन तो सही तरीके से हो जाए। मनरेगा को ईमानदारी से धरातल पर उतार दिया जाए तो बड़े स्तर पर मजदूरों को अपने घर में काम मिल जाएगा साथ ही आधारभूत संरचनाओं का भी विकास होगा और मजदूरों के पलायन को रोकना संभव हो सकेगा।
गुरुवार, 21 जुलाई 2011
नरेगा से सम्ब/न्धित शिकायत दर्ज करायें
यदि किसी व्यदक्ति को, जिसने मनरेगा अधिनियम 2005 के तहत काम के लिए आवेदन किया हो और अब तक उसे कोई काम नहीं मिला हो या उसे काम के बदले नियमित भत्ता नहीं मिलता हो तो ऐसे मामलों की शिकायत अपने राज्य के सम्बयन्धित अधिकारी को ऑनलाइन रूप दर्ज करवा सकते हैं।
मनरेगा शिकायत कब दर्ज कराएँ
आप अपनी शिकायत इन परिस्थितियों में दर्ज करवा सकते हैं-
पंजीकरण/ जॉब कार्ड के मामले में
•यदि ग्राम पंचायत जॉब कार्ड के लिए पंजीकरण नहीं कर रही हो,
•यदि ग्राम पंचायत जॉब कार्ड जारी नहीं कर रही हो,
•यदि जॉब कार्ड मजदूरों को नहीं दिया जा रहा हो।
भुगतान के मामले में
•भुगतान में देरी की जा रही हो,
•आंशिक भुगतान किया जा रहा हो,
•कोई भुगतान नहीं किया जा रहा हो,
•अनुपयुक्तन तरीकों का इस्तेहमाल किया जाता हो।
मापन के मामले में
•समय पर मापन न किया जाता हो,
•अनुपयुक्तप रूप से माप किया जाता हो,
•मापन के लिए इंजीनियर नहीं आते हों,
•माप उपकरण मौजूद नहीं हों।
काम की माँग के मामले में
•माँग का पंजीकरण नहीं किया रहा हो,
•तारीख पड़ी रसीद जारी नहीं की जा रही हो।
काम का आवंटन
•काम उपलब्धल नहीं हों,
•5 किलोमीटर के दायरे में काम आवंटित नहीं किया जाता हो,
•5 किलोमीटर से अधिक दूरी पर कार्यस्थील के लिए टीए/डीए नहीं दिया जाता हो,
•समय पर काम आवंटित नहीं किया जाता हो।
कार्य प्रबंधन के मामले में
•कार्य सृजित नहीं किया जाता हो,
•कार्य के लिए स्वा स्य्हो सुविधाएँ मौजूद न हों,
•अर्द्धकुशल/ कुशल को वेतन का भुगतान नहीं किया जाता हो।
बेरोजगारी भत्ताो के मामले में
•बेरोजगारी भत्तेि का भुगतान नहीं किया जाता हो,,
•आवेदन स्वीकार नहीं किया जाता हो।
अनुदान के मामले में
•अनुदान उपलब्धस नहीं हो,
•अनुदान का हस्तां तरण नहीं होता हो,
•आंशिक अनुदान हों,
•वेतन के हस्तां तरण के लिए बैंक द्वारा शुल्क वसूल की जाती हो।
सामग्री के मामले में
•सामग्री उपलब्धा नहीं हो,
•मूल्यर में बढ़ोतरी हो गई हो,
•सामग्री खराब गुणवत्ताा वाली हो।
शिकायत कौन दायर करा सकता है
•कामगार
•नागरिक
•एनजीओ
•मीडिया
•गणमान्य व्यक्ति (वीआईपी)
शिकायत को जमा करने की प्रक्रिया
नरेगा से सम्बान्धित शिकायत ऑनलाइन दर्ज कराने के लिए निम्ना प्रक्रिया अपनाएँ:
चरण 1: नरेगा से सम्ब न्धित अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए यहाँ क्लिक करें।
चरण 2: अपने राज्यa के नाम पर क्लिक करें।
चरण 3: एक आवेदन पत्र दिखाई देगा।
चरण 4: सबसे पहले अपना पहचान पत्र चुनें, चाहे आप कामगार हों या नागरिक या एनजीओ या मीडिया या वीआईपी।
चरण 5: नरेगा में अनियमितता सम्बेन्धीत सूचना आपको जहाँ से मिली हो, उसका स्रोत बताएँ।
चरण 6: दिये गये बॉक्सअ में जरूरी सूचना भरें और 'शिकायत जमा करें' बटन पर क्लिक करें।
दर्ज शिकायत की स्थिति पता करना
•अपनी शिकायत दर्ज कराने के बाद उसकी स्थिति की जानकारी ऑनलाइन रूप से पता कर सकते हैं कि उसका निपटारा हुआ या नहीं।
•नरेगा से सम्बउन्धित शिकायत की स्थिति पता करने के लिए यहाँ क्लिक करें।
रविवार, 29 मई 2011
सोमवार, 2 मई 2011
सोनिया गांधी के नाम एक बिहारी की चिट्ठी
सादर अभिवादन,
मैं एक जागरूक नागरिक की हैसियत से आपको यह मेल भेज रहा हूँ. दरअसल बिहार के राज्यपाल माननीय देवानंद कोंवर जी भ्रष्टाचार की सारी हदों को पार कर चुके हैं. इनसे पहले बिहार में इतने भ्रष्ट राज्यपाल आदरणीय बूटा सिंह को छोड़कर दूसरे कोई नहीं आए. बहुत दिनों बाद या यूँ कहें पहली बार बिहार को नीतीश कुमार जैसा दृढ़ इच्छाशक्तिसंपन्न, संवेदनशील और विकासोन्मुख एवं सकारात्मक विचार संपन्न मुख्यमंत्री नसीब हुआ है. उनके कार्यों से लगता है वे बिहार को आधुनिक और विकसित बनाने हेतु दिन-रात स्वप्न देखते हैं और उस स्वप्न को सत्य में बदलने हेतु प्रयत्नशील रहते हैं. ऐसी परिस्थिति में माननीय राज्यपाल उच्च शिक्षा के क्षेत्र के अवसान हेतु दिनानुदिन नए-नए कीर्तिमान स्थापित करने में मशगुल हैं. सबसे पहले तो वे विश्वविद्यालयों के कुलपति की नियुक्ति में बिना राज्य सरकार से विचार-विमर्श किए अवैध तरीके अपनाए, फिर उपकुलपति की नियुक्ति का तरीका भी वही रहा. विश्वविद्यालयों के कुलपति को शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु चर्चित होना चाहिए था, पर, दुर्भाग्य से जयप्रकाश विश्वविद्यालय के कुलपति श्री दिनेश प्रसाद सिंह बिहार की प्रसिद्द गायिका देवी के साथ छेड़छाड़ हेतु चर्चित हुए. हद तो तब हो गयी जब राज्य सरकार के पुरजोर आग्रह के बावजूद राज्यपाल ने उन्हें कुलपति जैसे सम्मानित पद से नहीं हटाया. मेरे पास प्रमाण तो नहीं हैं पर कहनेवालों की मानें तो कुलपति की नियुक्ति में राज्यपाल द्वारा पचास लाख से एक करोड़ रूपए तक वसूले गए हैं, उपकुलपति हेतु पन्द्रह लाख से पचीस लाख रूपए, यहाँ तक कि कालेजों के प्राचार्य की नियुक्ति में कुलपतियों द्वारा दस से लेकर पैंतीस लाख रूपए तक वसूले गए जिसमें निर्विवाद रूप से महामहिम की भी हिस्सेदारी रहती थी. अन्ना हजारे को प्रेषित पत्रोत्तर में आपने भ्रष्टाचार के विरुद्ध हर आन्दोलन को सहयोग एवं समर्थन देने का आश्वासन दिया है जो काबिलेतारीफ है. मुझे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आपकी तत्परता को देखते हुए पूरी उम्मीद है कि मेरे मेल पर गंभीरतापूर्वक विचार करते हुए वर्तमान राज्यपाल को हटाकर किसी स्वच्छ छवि को आसीन करेंगी.
आपका विश्वासी-
रजनीश कुमार,
ग्राम पोस्ट - अरई,
थाना - दाउदनगर,
जिला - औरंगाबाद (बिहार),
पिन - ८२४१४३
रविवार, 10 अक्टूबर 2010
ईमान
वोट की खातिर अपना ईमान बदलते हैं।
कभी वास्ता ना रहा जिनका भगवान से;
पल-पल वो अपना भगवान बदलते हैं।।
शनिवार, 25 सितंबर 2010
तंत्र व्यवस्थित ढ़ंग से एवं ईमानदारी से काम करे तो विकास की गति कई गुणा बढ़ जाएगी
पर, मेरी समझ है कि तंत्र व्यवस्थित ढ़ंग से एवं ईमानदारी से काम करे तो विकास की गति कई गुणा बढ़ जाएगी साथ ही सामाजिक समस्याओं खासकर अति गरीबी को तो दूर किया ही जा सकता है। इसे दूसरे शब्दों में यूँ कहें कि किसी को परमावश्यक आवश्यकताओं की कमी नहीं खलेगी। भोजन के लाले नहीं पड़ेंगे, रहने को घर मिल जाएगा और पहनने को कपड़े। आज आधी आबादी की मूलभूत आवश्यकतायें पूरी नहीं हो पाती, मैं इसके कारणों के विशद विवेचना में नहीं जाना चाहता पर प्रशासन में भ्रष्टाचार कैंसर की तरह फैल गया है जो मुख्य वजह है।बहुत सारी शानदार योजनायें हमारी सरकार के द्वारा चलायी जा रही है, इन पर पानी के तरह पैसे बहाए जा रहे हैं, पर परिणाम वही ढ़ाक के तीन पात रहते हैं।
सबसे पहले तो शुरुआती स्तर से ही पढ़ाई की व्यवस्था बिल्कुल दुरुस्त होने चाहिए। लोगों को इस लायक जरुर बनाया जाए कि वे कम से कम अपनी समस्या तथा उसके कारणों से अवगत हो सकें, साथ ही उस समस्या के निराकरण हेतु उपलब्ध उपचार को अपनाने हेतु ललक रख सकें। यहाँ तो स्थिति यह है कि आप अहले सुबह या शाम में सड़क पर निकल जाएँ तो सड़क के दोनों किनारे शौच करनेवालों की लंबी कतारें मिलेंगी।
पढ़ा-लिखा आदमी हमेशे ही अपने जीवन-स्तर को बेहतर बनाने की सोचता है, अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहता है और उपलब्ध विकल्पों को अपनाने में हिचकता नहीं। अभी तो मैं देखता हूँ एक-एक आदमी के बारह-बारह बच्चे हैं। एक अपने खाने-पीने, रहने की उचित व्यवस्था नहीं और बारह बच्चों को पैदा कर दिया, भाई समस्या तो पहले से ही थी, अब तो समस्या विस्फोट में बदल रही है। परिवार-नियोजन के साधनों का काफी प्रचार-प्रसार भी किया जा रहा है, पर जो अत्यंत गरीबी बदहाली में जी रहे हैं, उन्हें आज भी नहीं पता परिवार को कैसे सीमित रखा जाए। कोई बताता भी है तो वे अपनाने को तैयार नहीं होते, क्योंकि उनका मानसिक स्तर इस लायक नहीं हो पाया है।
अब इनके हित के लिए जो योजनाएँ हैं, उनका क्या हश्र होता है ये तो सभी को मालूम है। इन योजनाओं की ऐसी की तैसी इसलिए होती है, क्योंकि वे जागरुक नहीं हैं, पढ़े-लिखे नहीं हैं। इनमें जानकारी के अभाव के चलते व्यवस्था का विरोध करने के साहस का अभाव है। और मैं एक बात बता दूँ, कोई भी समाजसेवी उनकी फिक्र उस हद तक नहीं कर पाएगा, जितना वे स्वयं करेंगे। गरीब, दलित, पिछड़ों (कृपया जाति के आधार पर न देखें) के उद्धार के लिए उन्हें स्वयं शिक्षित करना होगा, जागरुक बनाना होगा। एक बार उन्हें गुणवत्तायुक्त शिक्षा मुहैया करा दिया जाए तो फिर वे स्वयं सक्षम हो जायेंगे अपनी सारी समस्याओं को सुलझाने में। फिर किसी मुखिया जी या बीडीओ साहब में हिम्मत नहीं होगी कि वे प्रतीक्षा सूची के अनुसार इन्दिरा आवास का आवंटन न कर मनमाना करें और प्रति इन्दिरा आवास पाँच हजार रुपए वसूलें।
हर पंचायत में अमूमन दस से बीस लाख रुपए प्रत्येक वर्ष मनरेगा में खर्च हो रहे हैं, लेकिन वास्तव में धरातल पर बीस प्रतिशत राशि का भी व्यय नहीं हो पा रहा। चर्चा होती है कि बिहार में निवेश नहीं हुआ, फैक्ट्री नहीं लगी, मजदूरों का पलायन अन्य प्रदेशों में हो रहा है। और तो और महाराष्ट्र, गुजरात, आसाम सब जगह बिहारी मजदूर पीटे जा रहे हैं। निवेश नहीं हुआ तो नहीं हुआ, मनरेगा को तो ईमानदारी से कार्यान्वित करा दीजिए। जो काम बिहार सरकार के हाथ में है उसका कार्यान्वयन तो सही तरीके से हो जाए। मनरेगा को ईमानदारी से धरातल पर उतार दिया जाए तो बड़े स्तर पर मजदूरों को अपने घर में काम मिल जाएगा साथ ही आधारभूत संरचनाओं का भी विकास होगा और मजदूरों के पलायन को रोकना संभव हो सकेगा।
हमारे यहाँ बहुत सारी महत्वाकाँक्षी सरकारी योजनाएँ हैं पर सब के सब भ्रष्टाचार के दलदल में फँसी हुई हैं,
उदाहरणार्थ-----इन्दिरा आवास योजना, राजीव गाँधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना, मनरेगा, बीआरजीएफ, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, सर्व शिक्षा अभियान इत्यादि।
मैंने इन सारी योजनाओं को बेहद करीब से देखा है, इनको लागू कराने के लिए प्रयास किया है और अपने प्रयास में सफल हुआ हूँ। पर, जैसा कि मैंने पहले कहा है मैं उनकी समस्याओं के समाधान हेतु अपनी ऊर्जा का कुछ अंश तो लगा सकता हूँ, अपना सर्वस्व न्योछावर नहीं कर सकता। सभी लोगों का सामाजिक जीवन के साथ-साथ व्यक्तिगत जीवन भी होता है और स्वाभाविक रुप से व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाएँ भी। इसका एकमात्र उपाय है जिनकी समस्या हो उन्हें इस योग्य बना देना ताकि समस्या का समाधान निकालना उनकी व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षा बन जाए।
शुक्रवार, 3 सितंबर 2010
सरकार तो सबसे बड़ी संगठन होती है फिर यह ड्रामा कैसा?
क्या सरकार से ज्यादा संसाधन नक्सलियों के पास हैं?
नक्सलियों के प्रति लोगों में बहुत गुस्सा है, अधिसंख्य लोगों की ख्वाहिश है कि इनके प्रति कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए। पर, सरकारी तंत्र में दृढ़ इच्छा-शक्ति का बिल्कुल अभाव दिखता है, बस मीडिया में बयानबाजी की जा रही है कि आर-पार की लड़ाई की जाएगी।
अभी-अभी साधना न्यूज पर एक सज्जन जो कि घटनास्थल से होकर आए थे का कहना था कि यहाँ आपलोग कह रहे हैं कि कॉम्बिंग ऑपरेशन चल रहा है पर वास्तव में घटनास्थल पर ऐसा कुछ नहीं है- पुलिस एवं सीआरपीएफ के लोग कजरा पहाड़ी के नीचे से घूम कर आ रहे हैं और कह रहे हैं कि कॉम्बिंग ऑपरेशन चला रहे हैं। वे तो यहाँ तक कह रहे थे कि क्या चार वीवीआईपी (मुख्यमंत्री, सरकार के मंत्री आदि) को नक्सलियों द्वारा अगवा कर लिया जाता तो भी इसी तरह की टाल-मटोल की नीति अपनायी जाती, शायद नहीं और तब कार्रवाई निर्णायक होती।
नेतृत्व, समन्वय, संसाधन, संचार, साहस सबका साफ अभाव दिखता है ऐसे मौकों पर।
यहाँ से आतंकवादियों की खेप को कंधार पहुँचाने का उदाहरण मिलता है|
ताज-ओबेरॉय पर हमला होता है तो हर अत्याधुनिक संसाधनों का इस्तेमाल होता है और सैनिक-अर्धसैनिक बलों ने अपने प्राण की आहुति देकर भी लोगों के जान बचाए पर जब स्वयं हमारे सुरछाकर्मियों की बात आती है तो सरकार केवल आर-पार या निर्णायक लड़ाई का स्वांग रचती है।
आज जब विज़ान इतना विकसित हो गया है,हर तरह के संसाधन विकसित हो गए हैं,
सरकार के पास गैरजरुरी कार्यों के लिए भी पानी की तरह बहाने के लिए पैसे हैं तो फिर इन मध्ययुगीन टाइप आक्रांताओं से निपटने में सरकार को इतनी परेशानी क्यों हो रही है?
कोई नक्सली मोबाइल से तीन-तीन दिन तक मीडिया में दिन-दिन भर बात करता है, सीधे मुख्यमंत्री से बात करने की शर्त रखने का हिमाकत करता है और कोई उसे ट्रेस तक नहीं कर सका या ऐसा करने का साहस नहीं जुटा सका।
वे खुलेआम सरकार को धमकी देते हैं, तो जनता अपने को सुरछित कैसे महसूस करे?
प्रदेश की पूरी जनता सरकार की मजबूरी-लाचारगी को देख-समझ रही है, क्या इससे लोगों का भरोसा नहीं उठेगा सिस्टम से?
क्या लुकस टेटे की हत्या के बाद भी बातचीत का कोई औचित्य बचा है?
अभी भी मौका है, जनता की संवेदना सरकार के साथ है, सरकार बहुत शक्तिशाली होती है, उसमें प्रदेश की पूरी जनता की शक्ति निहित है। नेतृत्व इस शक्ति का अपमान न कराए,नक्सलियों को उनकी औकात बताने के लिए हर हथकंडे अपनाए जाएँ। प्रदेश की जनता इस बार निर्णायक कार्रवाई चाहती है|
जो सही समय पर सही निर्णय लेगा वही हमारा हीरो (नेता) होगा।
सोमवार, 10 मई 2010
Real hero of community policing
May we expect such effective and reasonable policing in all districts of Bihar ? Mr. Vikas Vaibhav is real hero of community policing. He is doing very very good in Rohtas.
This message has also been sent to our chief minister Sri Nitish Kumar ji and we may expect that all SP's residential phone will be connected to 100 like Rohtas district.
शनिवार, 8 मई 2010
बधाई हो अनिमेष
सोमवार, 26 अप्रैल 2010
संकट में नौजवान टीवी जर्नलिस्ट




- लेखक : अतुल पाठक, 25-Apr-10
बात अक्षय की जो एक बीमारी से पीडित है। बीमारी ने उसे ऐसा जकड़ा कि इलाज में पिता की जीवन भर की पूंजी खर्च हो गई इसके बाद भी वो ठीक नही हुआ क्योंकि तब तब इस बीमारी की सही थेरेपी नही आई थी। अब जबकि बीमारी के इलाज की कारगर पद्धति आ गई है पिता के पास बेटे के इलाज के लिए पैसे नही है। यदि समय पर इलाज नही मिला तो युवक का जीवन बचाना मुश्किल होगा।
नाम अक्षय कत्यानी हटटा कटटा गबरू जवान 70 किलो वजन दिखने में स्मार्ट, लेकिन एक बीमारी ने उसे 40 किलो का हाडमांस का पुतला बना दिया । पढाई पूरी की तो टीवी जर्नलिस्ट बन गया लेकिन इस बीमारी के कारण नौकरी छोडनी पड गई और बिस्तर पकड लिया। प्रायवेट बिजनेस करने वाले पिता सुधीर कात्यानी ने बेटे के इलाज के लिए अपने जीवन भर की कमाई खपा दी। गाड़ी बंगला बेच दिया। लेकिन वो ठीक नही हुआ। अब अचानक डाक्टरों ने बताया कि इस बीमारी का कारगर इलाज आ गया है। सिर्फ दो लाख खर्च होंगे। लेकिन अब जबकि वो दाने - दाने को मोहताज हो गए हैं। बेटे के इलाज के लिए दो लाख कहां से लाएं तो क्या इकलौते जवान बेटे को यूँ ही हाथ से चले जाने दे।
मजबूर पिता क्या करे? मदद के लिए सबने हाथ खडे कर दिए हैं। बेटे को अल्सरेटिव्ह कोलाईटिस है। खून की उल्टी दस्त होते हैं। खाना खाते नही बनता। कैंसे माँ - बाप अपने जिगर के टुकडे को तिल - तिल मरते देखें। एक तो बीमारी दूसरा मां - बाप की बेबसी बेटे से देखी नही जाती वो भी ऐंसी जिंदगी से निराश होता जा रहा है। आखिर क्या करे वो कहां जाए। उसकी भी इच्छा है कि मां-बाप के सपनो को पूरा करे। अभी तो पूरी जिंदगी पडी है उसके सामने। सिर्फ दो लाख के पीछे क्या जान जली जाऐगी उसकी। फिलहाल पैसे के अभाव में इलाज रूका है। क्या इस नौजवान को हम दुनिया से विदा हो जाने दें। ऐसे समय में समाज को सामने आना होगा। इस नौजवान की मदद के लिए आईए और इसकी मदद कीजिए। रोशन कीजिए अक्षय की दुनिया को जी लेने दीजिए एक जवान को अपनी पूरी जिंदगी ।
(अतुल पाठक , संपर्क : atul21ap@gmail.com_)
यदि आप अक्षय की कोई मदद करना चाहते हैं तो इन नम्बरों पर संपर्क कर सकते हैं :
योगेश पाण्डेय - 09826591082,
सुधीर कत्यानी (अक्षय के पिता) - 09329632420,
अंकित जोशी (अक्षय के मित्र) - 09827743380,09669527866
Thanks & Regards,
Pushkar Pushp
Editor - in - Chief,
Media Mantra
http://mediakhabar.com
http://mediamantraonline.com
India's First Bilingual Media Website
09999177575.
Respected all,
I am extremely shocked to read this. Although I was unknown to him but called him today and wish for his quick betterment. God bless him.
Regards-
Rajnish Kumar
www.rajnisharai.blogspot.com
Information for making help-
Name- Sudhir Kumar Katyayani,
Account No.- 09322011002264,
Bank Name- Oriental Bank of Commerce,
Branch- Arera Colony Branch, Bhopal (M.P.),
Residential Address- M 365, Bharat Apartment (Near Water Tank),
Gautam Nagar, Bhopal (M.P.),
Mob-09329632420
मंगलवार, 20 अप्रैल 2010
मुख्यमंत्री बिहार श्री नीतीश कुमार जी के नाम मेरा पत्र
सादर अभिवादन,
कहा जाता है कि प्रशंसा सामने नहीं करनी चाहिए। मैं आपकी प्रशंसा नहीं कर रहा, पर आपने बिहार और बिहारवासियों का रेपुटेशन बदल दिया। हमलोग वास्तव में जंगलराज में रह रहे थे, यह पहले से ज्यादा अब पता चलता है। पहले हमलोग जंगलराज में रहने को अभ्यस्त हो गए थे, उम्मीदें खतम हो चुकी थी, संभावनाएँ दिख नहीं रही थी, हर जगह अराजकता का माहौल था। वैसी स्थिति से जब आज तुलना करते हैं, तो लगता है कि दृढ़ इच्छा शक्ति और कुशल नेतृत्व से बदलाव संभव है। महिला सशक्तीकरण की बात तो सभी करते हैं, पर इस दिशा में काम आपने किया और शानदार किया। पहले गाँव देहात में अगर कोई लड़की साईकिल पर चलती दिख जाती तो वहां के लिए यह अजूबा होता था और लोग फब्तियाँ कसते थे। पर, आज झुँड के झुँड लड़कियों को सुदूर देहातों में साईकिल की सवारी करते हुए देखा जा सकता है, इससे उनमें आत्मविश्वास का संचार हुआ है, मनोबल बढ़ा है और कुछ करने की तमन्ना जागी है। मैं उम्मीद करता हूं कि लोग लंद-फंद की बातों से ऊपर उठकर विकास को तरजीह देंगे और आपको पुनः सत्तासीन करेंगे।
विश्वासी-
रजनीश कुमार
ग्राम पोस्ट - अरई
थाना - दाऊदनगर
जिला - औरंगाबाद (बिहार), ८२४११३
गुरुवार, 1 अप्रैल 2010
अरुंधती राय जैसे बुद्धिजीवियों को सामाजिक रुप से हतोत्साहित करने की जरुरत है।

आउटलुक का नवीनतम अंक मेरे सामने पड़ा है। प्रसिद्ध लेखिका, तथाकथित समाज सेविका एवं शब्दों की धनी अरुंधती राय का आलेख पढ़ा। किसी रोमांचकारी उपन्यास के लहजे में लिखे गये उनके यात्रा वॄतांत में "देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को गंभीरतम खतरा" को मजाक के तौर पर बार-बार दुहराया गया है। मेरी राय में माओवादियों से ज्यादा खतरनाक हैं ऐसे बुद्धिवादी। ये तथाकथित बुद्धिवादी, उत्पन्न कर रहे हैं देश के लिए गंभीरतम खतरा। किसी भी समस्या का समाधान हिंसा नहीं है, सच कहें तो, हिंसा अपने आप में सबसे बड़ी समस्या है। पर, अरूंधती राय ने इस आलेख में ऐसा जिक्र किया है जैसे ये माऒवादी ही हैं, जो सिस्टम के जुल्म से सर्वाधिक पीड़ित हैं- उनकी हत्याएं होती रही हैं, बलात्कार होता रहा है, विस्थापित होते रहे हैं, लूटे-खसोटे जाते रहे हैं। यहां तक कि उन्होने अपने विवेक से अपने इस आलेख में अनुमानित परिणामों तक का जिक्र कर दिया कि "फलां पर अगर पुलिस की नजर पड़ जाए तो उसे सीधे गोली मार दी जाएगी, और संभव है कि गोली मारे जाने से पहले उससे कई बार बलात्कार की जाए"।
हिंसक संगठनों ने अपनी हिंसा को सामाजिक मान्यता दिलाने के लिए विभिन्न वादों का सहारा लिया। मसलन माऒवाद, मार्क्सवाद, लेनिनवाद इत्यादि। इन तथाकथित वादियों का मुख्य काम है-
जात-पात आधारित हिंसा करना,
समाज में भय उत्पन्न कर लेवी के रुप में भयादोहन करना।
ये वर्गशत्रु और सर्वहारा की दलिल देते हैं। सबसे बड़े वर्गशत्रु तो ये नक्सली खुद हैं। प्राय: सरकारी विद्यालयों में गरीब तबके के लोगों के बच्चे ही पढ़ते हैं, पर इन दिनों सरकारी विद्यालय भवनों को नक्सली बेहिचक निशाना बना रहे हैं। ये अपने अराजक कार्यों को जायज ठहराने के लिए थोथी लॉजिक देते हैं अथवा किसी वाद का जामा।
अगर समाज को मजबूत बनाना हो तो नागरिकों में शिक्षा की ज्योत जगानी चाहिए, उन्हें जागरूक बनाना चाहिए। पर, पता नहीं ये किसे शिक्षित कर रहे हैं और कैसी जागरुकता फैला रहे हैं।
प्राय: नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में निर्माण कंपनियों से लेवी के रुप में भारी रकम की वसूली की जाती है, जिसका असर अंतत: निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर पड़ता है। क्या नक्सलियों का यह कदम सर्वहारा के हित में है?
यूं ही आदतन भय फैलाने हेतु अथवा हथियार लूटने के क्रम में नक्सलियों द्वारा अक्सर पुलिसकर्मियों की हत्याएं की जाती हैं। अधिकतर पुलिसकर्मी गरीब परिवारों के ही सदस्य होते हैं, जिन्हें किसी भी ऐंगल से तथाकथित वर्ग-शत्रु की परिभाषा में फिट नहीं बैठाया जा सकता।
बिहार में नक्सलियों द्वारा जो सैकड़ों जातीय नरसंहार किए गए, क्या उन्हें कहीं से भी सिद्धान्त का जामा पहनाया जा सकता है?
अरुंधती राय को अपने चन्द दिनों की पिकनिक में ही सारे तथ्यों का पता चल गया। क्या वे कभी इन नक्सलियों के बारुद से जले लोगों से मिले हैं?
उन माँऒं से मिले हैं, जिनके बेटे का अंतिम संस्कार सर और धड़ की पहचान नहीं होने के कारण अनुमान के आधार पर किया गया?
मिले हैं उन बहनों से, जिनके भाई दो जून की रोटी कमाने हेतु कड़े मेहनत के बाद सिपाही में भर्ती हुए थे, पर नक्सलियों द्वारा बिछाए लैण्ड माइन्स के विस्फोट में अपनी जान गँवा बैठे?
बूढ़े बाप को अपने बेटे के कंधे की उम्मीद थी पर, उसे अपने बेटे को ही कंधा देना पड़ा इन जुल्मियों के कारण।
प्राय: चुनावी गुणा-गणित के चलते राज्य सरकारें नक्सलियों के विरुद्ध नरम रुख रखते हैं, जिससे उनका मनोबल बढ़ते चला जा रहा है। जरूरत है इनके विरूद्ध निर्णायक कार्रवाई की। अरुंधती राय जैसे बुद्धिजीवियों को भी सामाजिक रुप से हतोत्साहित करने की जरुरत है।
शुक्रवार, 26 मार्च 2010
आज का नेता कैसा हो, बिल्कुल मेरे जैसा हो।
मैं आपको एक छोटा सा उदाहरण देता हूँ। हमारे प्रखंड दाऊदनगर में भारतीय खाद्य निगम का क्रय केन्द्र खुला है, जहाँ सहकारी समितियों के माध्यम से धान-चावल की खरीद होती है। इस क्रय-केन्द्र को प्रतिदिन मात्र दो लाख रुपए भुगतान करने की क्षमता प्राप्त थी, जबकि प्रतिदिन खरीद लगभग पंद्रह लाख रुपए की हो रही थी। इससे, सहकारी समितियों का लगभग दो करोड़ रुपए का भुगतान लंबित हो गया था। भुगतान न होने से स्थानीय किसानों में भी रोष बढ़ने लगा था। जनप्रतिनिधियों को भनक मिली तो उन्होने इस मुद्दे को सुलझाने हेतु कोई सार्थक कदम तो नहीं उठाया पर स्थानीय समाचार पत्रों में अपना नाम जरूर छपवाया, सड़क जाम करने की घोषणा की तथा प्रखण्ड कार्यालय को घेरने की भी बात कही। जब यह समस्या भारतीय खाद्य निगम से जुड़ी है, तो इसके लिए बेवजह रोड जाम करना या प्रखंड कार्यालय का घेराव करना मुझे प्रासंगिक नहीं लगा। मैंने इण्टरनेट पर Food Corporation of India का Website खंगाला तथा सभी संबंधित अधिकारियों (CMD, ED East, GM PE, GM Finance & Accounts, GM Bihar etc.) का मोबाईल नंबर तथा इमेल आईडी पता किया तथा वास्तविक समस्या से अवगत कराया। एक घंटे बाद ही जोनल मैनेजर (पूर्व) श्री सुशील नागपाल जी ने समस्या के शीघ्र निराकरण का आश्वासन दिया। बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ कि एक हफ्ते के अंदर ही पीपीसी दाऊदनगर की प्रतिदिन भुगतान क्षमता को दो लाख से बढ़ाकर पचास लाख रुपए कर दिया गया। सुखद इसलिए कि समस्या का समाधान हो गया और आश्चर्य इसपर कि सरकारी विभागों का काम भी इतना त्वरित होता है।
तो आप बताइए असली नेता कौन - मैं या ………………………..?
रविवार, 14 मार्च 2010
अथ श्री इन्दिरा आवास कथा
सबसे पहले तो बता दूँ कि इन्दिरा आवास के लिए निर्धारित मापदण्ड तय करते समय ही संबंधित अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि ने भयंकर गलती (जान-बूझकर) की। बीपीएल सूचि बनाते समय गरीब और अमीर के निर्धारित मापदण्ड के अनुसार सर्वे न कर मनमाने ढंग से मुखिया के व्यक्तिगत संबंध के अनुसार सूचि में स्थान दिया गया। फिर मुखिया द्वारा इन्दिरा आवास के लाभार्थियों से पाँच-पाँच हजार रुपये की वसूली की गयी और वैसे लोगों को भी लाभान्वित किया गया जिनका या तो पक्का का मकान है या पहले से इन्दिरा आवास का लाभ उठा चुके हैं। विदित हो कि इस संबंध में स्पष्ट रुप से इन्दिरा आवास के नियमावली में लिखा गया है कि जो पहले से इन्दिरा आवास ले चुके हैं या जिनका पक्का का मकान हो, उन्हें इन्दिरा आवास आवंटित नहीं किया जाएगा। मैंने इस संबंध में स्थानीय प्रखंड विकास पदाधिकारी को स्पीड पोस्ट से पत्र भेजकर बाकायदे अयोग्य लाभार्थियों की पूरी सूचि सौंपी, जाँच भी हुई, प्रखंड विकास पदाधिकारी महोदय ने स्वीकार भी किया कि यह तो घोर अनियमितता है। उन्होने उचित कार्रवाई का आश्वासन भी दिया। पर लगभग एक सप्ताह के बाद पुनः बीडीओ साहब ने मोबाईल पर फोन कर सूचित किया कि "रजनीश जी, जाने दिजिए आपको इन सब चीजों से क्या लेना देना, ग्रामीण विकास मंत्री श्री भगवान सिंह कुशवाहा हमारे पास फोन कर काफी गुस्सा रहे थे और उन्होने कहा है कि जो सूचि है उन सब को चुपचाप इन्दिरा आवास का पैसा दे दो"। आखिर मेरी शिकायत का भी हश्र वही हुआ जो सबका होता है, पर मैं अब आगे क्या करुँ इस पर गंभीरता से सोच रहा हूँ, और कुछ ना कुछ नियमानुसार सार्थक कदम उठाऊँगा। हाँ, तो अभी कथा खत्म नहीं हुई है, कुछ लोगों को मैंने पैसा देने से रोका तथा उनका शपथ-पत्र वगैरह डाक से भिजवाया, क्योंकि जो घूस की रकम नहीं दे रहे थे उनका शपथ-पत्र वगैरह स्वीकार नहीं किया जा रहा था। अब उनसे पैसा वसूल करने के लिए इन्दिरा आवास का चेक प्रखंड में ही रोक कर रखा जा रहा है। इस संबंध में पूछने पर बीडीओ साहब ने बताया कि स्टाफ की कमी है, पर जिन्होने पैसा दे दिया था उसको तो स्टाफ की कमी नहीं खली। उसका चेक तुरत भेज दिया गया। चलिए, जिनके खाते में पैसा आ गया वे फिर शिकार बने बैंक प्रबंधक के। भ्रष्टाचारियों का गठजोड़ इतना तगड़ा रहता है, जिसकी पूछिए मत। प्रबंधक महोदय सभी लाभार्थियों से अपने लिए प्रति लाभार्थी पाँच सौ रुपए वसूले तथा जिन्होने मुखिया जी को पैसा नहीं दिया था उसे सत्यापित कराने के लिए मुखिया जी के पास भेज देते थे और फिर बिना पैसा लिए मुखिया जी सत्यापन कैसे करते। जहाँ तक मेरी समझ है, खाता खोलते समय ही खाताधारी का सत्यापन करा लिया जाता है और आवेदन पर परिचयकर्ता का भी दस्तखत होता है। फिर से सत्यापन कराने की बात गले नहीं उतरती। सबसे दुखद बात है कि अत्यंत गरीब तबके के लोग भी सूद पर कर्ज ले-लेकर घूस की रकम मुखिया तथा अन्य पदाधिकारी को देते हैं और ऐसे तो हमारे सामने सब सच बयान करते हैं, लेकिन जब शिकायत करने की बात आती है तो वे तैयार नहीं होते, यहाँ तक कि उनके बदले मैं शिकायत करता हूँ तो भी वे गवाही देने से डरते हैं। फिर भी मैं एकला चलो रे की तर्ज पे चलूँगा, शायद ये एकला कारवाँ में बदल जाए।
शनिवार, 27 फ़रवरी 2010
अच्छे को अच्छा कहना चाहिए


बिहार की पहचान थी अराजकता, चोरी, लूट, जातीय नरसंहार, रंगदारी, घोटाला इत्यादि। विधि-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं थी। सत्ताशीर्ष पर बैठे लोग क्रूरतम कुकृत्यों में लिप्त थे। सरकार पोषित अपराधियों के भय से लोगों का जीना मुहाल हो गया था। अगर लोगों की याददाश्त सही हो, तो मैं कुछ घटनाओं का जिक्र करना चाहूँगा। सबसे पहले मानवता को शर्मसार करनेवाली एक घटना- शिल्पी गौतम हत्याकाण्ड को याद किया जाए। जिसके हाथ में राज्य के नागरिकों ने सत्ता की चाबी सौंप दी, वही किसी के इज्जत के साथ-साथ जान भी ले ले और फिर इस विभत्स मामले को अपनी रसूख की वजह से कानूनी पेचिदगियों में उलझाकर कुटिल मुस्कान भरे, उस दानव को जनता सरेआम कत्ल नहीं करती यह आश्चर्य का विषय है। सामान्य आदमी कितना सहनशील या यूँ कहें बेबस है, इसका दूसरा उदाहरण है- राज्य के तत्कालीन मुखिया के घर शादी के अवसर पर उनके सहयोगी गुण्डे पटना के विभिन्न दुकानों से गाड़ी, फर्नीचर तथा अन्य कीमती सामान जबर्दस्ती उठाकर ले गये और प्रशासन मूकदर्शक अथवा गुण्डों की सहयोगी बनी रही। हत्या, बलात्कार तथा नरसंहार की खबरें आए दिन अखबारों की सुर्खियाँ रहते थे। प्रशासन में उच्च पदों पर आसीन लोगों को हर समय बेवजह नीचा दिखाया जाता था, उन्हें उनकी औकात बतायी जाती थी। आज नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद स्थिति बिल्कुल विपरीत है। नीतीश जी के कार्यों से उनकी इच्छाशक्ति झलकती है कि वे बिहार को विकसित बनाना चाहते हैं। उन्होने विधि-व्यवस्था को दुरुस्त किया है, राज्य में कानून का शासन स्थापित हुआ है। अब सड़क के मामले में हमलोग अन्य प्रदेशों से पीछे नहीं हैं। विद्यालय में पढ़ाई हो रही है, अस्पतालों में चिकित्सक के साथ दवाएँ भी उपलब्ध हैं। नीतीश जी, आप बहुत अच्छा कर रहे हैं, पर आपके ऑफीसर्स आपसे विपरीत आचरण कर रहे हैं। आपने उन्हें सम्मान दिया पर वे आपके साथ भी गद्दारी कर रहे हैं। आपके शासन में भ्रष्टाचार चरम पर है। पिछली सरकार में व्याप्त राजनीतिक गुण्डों की जगह सरकारी पदाधिकारियों ने ले ली है। वे बेफिक्र हैं, सुशासन में वे अपने को भगवान समझने लगे हैं।
बिहार में उच्च वर्ग के वोटर्स काफी संवेदनशील हैं, आपको सत्ता में लाने में उनकी काफी भूमिका भी रही है खासकर भूमिहार वर्ग का। वे आपसे सम्मान पाने की उम्मीद रखते हैं, पर इन दिनों आपके तेवर कुछ तल्ख प्रतीत होते हैं, मैं समझता हूँ अनावश्यक तल्खी चुनाव माहौल में ठीक नहीं। मैंने पिछले दिनों ऑरकुट के भूमिहार ब्राह्मण कम्यूनिटी पर एक थ्रेड पोस्ट किया था जिसमें सबसे राय माँगी थी कि (क्या आप बिहार के मुख्यमंत्री के रुप में नीतीश कुमार को दुबारा देखना पसंद करेंगे?)। 133 मंतव्यों में मात्र एक-दो ही विरोध में बोले, बाकि लोगों ने नीतीश जी को दुबारा मुख्यमंत्री बनाने की जरुरत बतायी। आज पाटलीपुत्रा कॉलनी, पटना में रहनेवाले एक प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता श्री मुक्तिनाथ शर्मा जी से बात हो रही थी। उन्होने भी यही कहा कि सब तो ठीक है, नीतीश जी की हर तरफ प्रशंसा हो रही है और उन्होने प्रशंसा करने लायक काम भी किया है पर इस प्रशंसा ने उनमें फाल्स इगो भर दिया है और यह अब सुपर इगो का रुप लेते जा रहा है, जो उनके चेहरे से भी झलकता है। मुख्यमंत्री जी, अगर सही में आप किसी जटिलता का शिकार हो रहे हैं तो उबारिए अपने आपको उससे और थोड़ा पदाधिकारियों की भी नकेल कसिए। मैं भूमिहारों की तरफदारी नहीं कर रहा, ना ही ललन सिंह अथवा अन्य उन जैसों को मैं अपना नेता मानता हूँ, मेरे आदर्श नेता तो माननीय नीतीश कुमार जी ही हैं, मैं भी चाहता हूँ कि बिहार के मुख्यमंत्री के रुप में पुनः नीतीश कुमार ही आसीन हों ताकि विकास की गति बनी रहे। हमारी संस्कारों में पूज्य समझी जानी वाली अबलाओं का चीरहरण ना हो। पर, इन सब बातों पर गौर कर माननीय मुख्यमंत्री जी को भी उच्च वर्ग की भावनाओं के प्रति बेहद संवेदनशील होना होगा।
बुधवार, 17 फ़रवरी 2010
दूसरों के लिए लड़ने वाले शशिधर की हत्या
जालिमों ने भ्रष्टाचार के दुश्मन और शोषित-पीड़ितों की आवाज उठाने वाले की जुबान को हमेशा के लिए खामोश कर दिया। सूचना के अधिकार को हथियार बनाकर भ्रष्ट जन प्रतिनिधियों और अधिकारियों को कटघरे में खड़ा करने वाले 30 वर्षीय शशिधर मिश्र उर्फ खबरीलाल की हत्या की खबर सुनकर लोग अवाक रह गए। फुलबड़िया पंचायत दो के निवासी शशिधर मिश्र की अपराधियों ने रविवार को देर रात गोली मारकर हत्या कर दी।
भाजपा से जुड़े लोकहित संघ नामक संस्था के कर्ता-धर्ता शशिधर को अपराधियों ने उस समय गोली मारी जब वे बाजार से घर का सामान खरीदकर लौट रहे थे। कोई भी उन्हें यूं ही खबरीलाल नहीं कहता था। जब भी किसी को कोई खास जानकारी करनी हो, नियम-कानून के बारे में पढ़ना-जानना और लड़ना हो तो वह खबरीलाल उर्फ शशिधर मिश्र के यहां हाजिर हो जाता था। उनके दरवाजे पर हर किसी की सेवा बिना लाग-लपेट और नि:स्वार्थ की जाती थी।
उनकी कार्यशैली से खफा कुछ असामाजिक तत्वों ने पिछले वर्ष भी उन्हें राष्ट्रीय उच्च पथ पर मारपीट कर अधमरा छोड़ दिया था। यहां उनकी जान बची, तो उनके घर में पिस्तौल छिपाकर पुलिस के लफड़े में उन्हें फंसाने की कोशिश की गई। लेकिन नापाक मंसूबे पालने वाले चित्त हो गए। शशिधर ने रविवार को खासकर अखबारनवीसों को बताया था कि दो दिन में वे आंगनबाड़ी से संबंधित एक बड़े घपले का खुलासा करेंगे और दोषी को सजा दिलाने को उच्चस्तर तक जाएंगे। क्षेत्र के आंगनबाड़ी केन्द्रों में सेविका-सहायिका के घालमेल से हो रही अनियमितता पर सूचना के अधिकार के तहत उन्होंने जानकारी मांगी थी।
लोगों का यह कयास है कि शायद इसकी भनक उन सफेदपोशों को लग गई, जो इस घालमेल से जुड़े थे और उन्हीं लोगों ने भाड़े के हत्यारों से शशिधर मिश्र की आवाज को शांत करा दिया। उन्होंने लोकहित के आधा दर्जन से ज्यादा मामलों का खुलासा किया और कई में दोषियों को सजा भी दिलवाई। इसी के चलते जहां उन्हें पसंद करने वालों की बड़ी संख्या थी, वहीं उनसे बुराई मानने वाले लोग भी थे। शशिधर मिश्र के भाई महेदर मिश्र ने हत्या में संलिप्तता के आरोप में पंचायत निवासी रंजीत मिश्र व उनके दो भाइयों सहित कुल पांच लोगों के खिलाफ फुलबड़िया थाने में शिकायत दर्ज कराई है। हत्या के विरोध में सोमवार को बाजार बंद रखा गया।
सोमवार, 15 फ़रवरी 2010
पटना में थ्री इडियट

अगर छात्र जैसे हम पढ़ाते हैं उससे नहीं सीखते तो वे जैसे सीखेंगे हम वैसे पढ़ायेंगे। कुछ ऐसा ही जज्बा लिए अच्छी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आकर्षक नौकरियों को छोड़कर तीन युवक पटना में इंजिनीयरिंग की तैयारी में लगे छात्रों का मार्गदर्शन करने आये हैं। तीनों आई॰आई॰टी रुड़की से 2007 बैच के अभियांत्रिकी में स्नातक हैं। उनमें से एक राकेश प्रकाश से मेरी भेंट ऑरकुट पर चैट से हुई। संयोग से अगले दिन इन तीनों से मेरी लाइव भेंट भी हुई। एकाएक तो लगा कि ये थ्री इडियट सिनेमा के पर्दे से बिहार की धरती पर कैसे। मैं राकेश और मनीष का पात्र परिचय तो नहीं कर सकता पर आयुष तो बिल्कुल माधवन के किरदार में फिट बैठ रहा था। कोई व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति को समाज से ही प्राप्त करता है और उसकी भी समाज के प्रति कुछ जिम्मेदारियाँ होती हैं। यही सामाजिक जिम्मेदारी का बोध इन्हें बिहार खींच लायी है, और ये अपनी मेधा का निवेश अपनी जमीं पर कर रहे हैं। और आप निवेश से आर्थिक फायदे की बात मत सोच लीजिएगा, बल्कि इन्हें बदले में चाहिए मानसिक संतुष्टि। जी हाँ, कोई ऐसा लड़का जिसमें मेधा है, पढ़ने की ललक है, आर्थिक दृष्टि से लाचार है तथा वह इंजीनियर बनना चाहता है उसके लिए इन लोगों ने मुफ्त में पढ़ाई-लिखाई के साथ रहने-खाने की भी व्यवस्था की है। है ना बेजोड़ निवेश। आप इनकी योजना को यहाँ क्लिक कर देख सकते हैं।
शनिवार, 30 जनवरी 2010
ग्राम अरई, प्रखंड-दाऊदनगर, जिला-औरंगाबाद में इन्दिरा आवास के आवंटन में हुई गड़बड़ी की जाँच हेतु।
मैं चन्देश्वरी राजवंशी, पिता स्व॰ बुधन राजवंशी, ग्राम-अरई, प्रखंड-दाऊदनगर, जिला-औरंगाबाद (बिहार) का निवासी हूँ तथा महादलित हूँ। आपकी सरकार महादलितों के विकास हेतु प्रतिबद्ध होने का दावा भी करती है। मैं अत्यंत गरीब आदमी हूँ। मैंने सूचना के अधिकार के तहत इन्दिरा आवास से संबंधित सूचना लोक सूचना पदाधिकारी सह प्रखंड विकास पदाधिकारी, दाऊदनगर से माँगी थी। अपने पत्र संख्या 49 दिनांक 21/12/2009 के द्वारा उन्होने मुझे बताया कि ग्राम पंचायत अरई में अभी अनुसूचित जाति में प्रतिक्षा सूचि के क्रमांक 200 तक ही इन्दिरा आवास संबंधी स्वीकृति पत्र दिया गया है। लेकिन, दूसरी तरफ (1) धनवंती कुँवर, पत्नी स्व॰ गौरीशंकर पासवान, जिनकी प्रतिक्षा सूचि में क्रमांक 202 (FID 5401, Score 11 )है तथा (2) प्राणीया देवी-सुखदेव राजवंशी, पिता श्री पूरन राजवंशी, जिनका क्रमांक 222(FID 6516, Score 11 ) है को इन्दिरा आवास बनाने हेतु पैसा मिला है। महाशय एक बड़े स्तर पर ग्राम पंचायत अरई में इन्दिरा आवास लाभुकों से दलालों द्वारा पैसा लिया गया तथा प्रतिक्षा सूचि तथा नियम कानून को धत्ता बताते हुए इन्दिरा आवास आवंटित किया गया।
अतः आपसे सादर निवेदन है कि मामले की निष्पक्ष जाँच करायें, तथा दोषियों पर समुचित कार्रवाई करें साथ ही मुझे बिना घूस की रकम दिए नियमानुसार इन्दिरा आवास आवंटित कराने में सहयोग करें।
विश्वासी-
चन्देश्वरी राजवंशी
ग्राम पोस्ट-अरई,
प्रखंड - दाऊदनगर,
जिला - औरंगाबाद (बिहार)
पिन - 824113
बुधवार, 27 जनवरी 2010
नरेगा धन पर गिद्ध दृष्टि

दुनिया जब मंदी के दौर से गुजर रही थी, उस समय भारत में नरेगा का जन्म हुआ। मजदूरों के संघर्ष ने रंग दिखाया और संप्रग सरकार ने ऎतिहासिक व क्रांतिकारी कानून बनाया। गरीब के लिए जीवनदान है नरेगा। इसके बनने के साथ-साथ इसे लागू करने के प्रावधान भी बहुत अच्छे बने। यह योजना पहले दौर में बहुत अच्छी चली, लेकिन लगातार हो रहे चुनावों ने हालात बिगाड़ दिए हैं। अब पंचायत चुनाव का दौर चल रहा है। इसमें सबकी नजर नरेगा के धन पर लगी हुई है। खर्चा करो, चुनाव जीतो और धन कमाओ। नरेगा से जहां गरीबों के लिए दो वक्त की रोटी मिलने लगी है, वहीं दलाल और भ्रष्टाचार करने वालों की भी पौ-बारह हो गई है।
आज कोई भी सरकार रोजगार गारंटी बंद नहीं कर सकती। सभी मजदूर चाहते हैं कि नरेगा ठीक से चले, उन्हें 100 रूपए पूरे मिलें तथा 100 दिनों की गारंटी में और दिनों का इजाफा हो। महंगाई के समानांतर मजदूरी भी बढ़े। राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में नरेगा श्रमिकों में 90 प्रतिशत महिलाएं काम पर जाती हैं। आज समय से भुगतान नहीं हो रहा है, पूरी मजदूरी नहीं मिल पा रही है, तब भी लोग डटे हैं इस योजना को बचाने के लिए। दुर्भाग्य है कि हमारा चुनाव तंत्र पैसों से इतना जुड़ गया कि धन-बल पर ही चुनाव लड़ा जा रहा है और यह धन-बल का तरीका लोकतंत्र के लिए खतरा बनता जा रहा है।
वैसे तो हर चुनाव में पैसे खर्च किए जाते हैं, लेकिन इस बार के चुनाव में बहुत खर्च किया जा रहा है। इस खर्चे के पीछे नरेगा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जब यह योजना नहीं थी, तब पंचायतों में इतना पैसा नहीं था। अब पंचायतों में दस गुना पैसा आ रहा है, लगभग हर पंचायत में प्रतिवर्ष एक से दो करोड़ तक आ रहा है। इसलिए जो लोग सरपंच बनने के लिए चुनाव में उतर रहे हैं, उसकी नजर 5 साल में आने वाले 10 करोड़ रूपयों पर है। यदि उसने दस प्रतिशत पर भी हाथ साफ कर लिया, तो 5 साल में एक करोड़ रूपए की कमाई होगी। जो सरपंच नरेगा के दौरान रह चुका है, वह तो इस चुनाव के दौर में अनाप-शनाप पैसे खर्च कर रहा है। कुल मिलाकर येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतना है। गांवों में जश्न मना रहे हैं, सरकार की मेहरबानी से हर गांव में अंग्रेजी शराब की दुकानें खुल चुकी हैं। गांव से दूर झुंड के झुंड बैठे नजर आते हैं। वहां पूरी रणनीति बनती है, जिसमें वोटों को खरीदा व बेचा जाता है, खरीदने वाला तो उम्मीदवार होता है और वोट बेचने वाले गांव के कुछ बिकाऊ दलाल होते हैं, इनकी इतनी चलती है कि वे अपना वोट ही नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले के, पूरी गुवाड़ी के वोटों को बेच देते हैं। उम्मीदवार पैसों से वोटों का सौदा करता है, मोलभाव हजारों रूपए से चालू होता है, लाखों में टेंडर छूटता है। प्रचार के दौरान दारू , मीट, चाय, समोसा-कचौरी आदि लगातार चलते हैं।
आज नरेगा कार्य क्षेत्र में महिलाएं ही ज्यादा दिखती हैं, लगभग 90 प्रतिशत, पुरूष तो बहुत कम होते हैं। पंचायतराज चुनाव में सरकार ने 50 प्रतिशत आरक्षण कर दिया है, लेकिन निर्णय करने की स्थिति आज भी महिलाओं के हाथ में नहीं है, कुछ अपवाद छोड़ दें तो ज्यादातर महिलाएं तो चुनाव में किसको वोट देना है, यह भी तय नहीं कर पाती हैं। यह काम भी पुरूष ही करते हैं। इस पूरी सौदेबाजी में महिलाओं की कोई भूमिका नहीं होती। उनसे वोट खरीदने की बात उम्मीदवार नहीं करते, उनका सामना भी नहीं करना चाहते, क्योंकि उनकी मांग बिलकुल साफ-सुथरी है। उनका नरेगा का भुगतान महीनों से बाकी है, पूरे काम करने पर भी पूरा भुगतान नहीं मिलता है, पंचायत में आवेदन भरवाने के लिए खूब चक्कर लगाने पड़ते हैं, तब भी आवेदन नहीं भरते हैं और जॉब कार्ड बनवाने के पैसे मांगते हैं। महिलाएं बोलती हैं, मजदूरी कम है और बढ़ाओ क्योंकि महंगाई बढ़ रही है। हैंडपंप खराब है, राशन की दुकान में गेहूं की आपूर्ति नहीं हो रही है।
अगर आपूर्ति हो भी रही है, तो वितरण नहीं हो रहा है। महिलाएं समस्याएं गिनाने लगती हैं, जिनका संतोषप्रद जवाब उम्मीदवारों के पास नहीं होता है। ऎसे में उम्मीदवार महिलाओं के पुरूष रिश्तेदारों से ही बात कर रहे हैं, वो भी गांव से दूर ले जाकर। महिलाएं तो यहां तक कह रही हैं कि इस चुनाव ने दारू नहीं पीने वालों को भी पीना सीखा दिया गया है। आखिरी दौर में वोटों को थोक में खरीदा जाता है, कुछ प्रमुख लोगों को बड़ी राशि दी जाती है, इससे भी बात बनती नजर नहीं आती है, तो घर-घर जाकर हर परिवार में पैसे बांटने का काम भी होता है, हर घर में गुड़ बांटना तो साधारण बात है। जरा सोचिए, यह कैसा लोकतंत्र है, जहां लोकतंत्र की जगह नोटतंत्र जलवे दिखा रहा है। ऎसा चुनाव किस काम व मतलब का है, जिसकी शुरूआत ही भ्रष्टाचार से होती है। सभी बेईमान नहीं हैं। 50 प्रतिशत महिलाएं तो इस तंत्र से बिलकुल अलग हैं, लेकिन उनकी चलने नहीं दी जाती है। आज महिला उम्मीदवार का प्रचार भी पुरूष ही कर रहे हैं और वह जीत गई, तो भी काम पुरूष ही करते हैं या बेटा काम संभालेगा या पति, महिला की तो केवल आड़ ली जाती है। लोगों की कमजोरी का पूरा-पूरा फायदा उठाया जाता है, बच्चों की कसम दिलाते हैं। महिला उस कसम से डर जाती है कि पता नहीं, कुछ गलत कर दिया तो कोई अनहोनी न हो जाए।
इन्हीं तौर-तरीकों से जीतने वाले उम्मीदवार नरेगा में भ्रष्टाचार कर धन कमाएंगे। फर्जी बिल लगेंगे, फर्जी कंपनियां बनेंगी, फर्जी सामान सप्लाई दिखाएंगे, काम ढंग के नहीं होंगे, फर्जी हाजिरियां भरी जाएंगी, बोलने वालों को पांच साल तक धमकाया जाएगा। ये लोग सामाजिक अंकेक्षण करवाने का विरोध भी करेंगे। खुद भी खाएंगे और इस तंत्र में ऊपर भी खिलाएंगे, ताकि ऊपर का तंत्र भी इनको बचाने का काम करे। आज नरेगा के सच्चे स्वरूप को बचाना जरू री है और लोकतंत्र को भी।
नोट-बिहार के पाठक सरपंच के जगह मुखिया पढेंगे।
अरूणा रॉय
लेखिका प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हैं
सहयोग : शंकर सिंह
रविवार, 17 जनवरी 2010
संभल के रहिए अभियान जारी है ।
पुनः मैंने मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत् अरई तथा मुसेपुर खैरा के बीच बननेवाले पुल को ठीकेदार द्वारा अन्यत्र बना देने पर ग्रामीण कार्य विभाग-2 के तत्कालीन कार्यपालक अभियंता श्री श्रीकांत प्रसाद से उस पुल से संबंधित सूचना माँगी थी । उक्त महाशय द्वारा प्राप्त सूचना के आधार पर मैंने विभागीय सचिव से लेकर मुख्यमंत्री तक शिकायत दर्ज करायी पर दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई । अलबत्ता जिम्मेवार कार्यपालक अभियंता श्री श्रीकान्त प्रसाद निगरानी विभाग द्वारा एक ठेकेदार से घूस लेते पकड़े गए तथा जेल की हवा खानी पड़ी ।
पुनः मैंने मध्य बिहार ग्रामीण बैंक, शाखा अरई में व्याप्त अराजकता एवं घूसखोरी से खिन्न होकर संबंधित लोक सूचना पदाधिकारी से केसीसी आवेदकों की लंबित सूची माँगी थी, जिसके उपरांत प्रबंधक द्वारा बहुत सारे आवेदकों से बिना घूस लिए उनका ऋण स्वीकृत किया गया तथा हम पर दाऊदनगर थाने में पैसा छिनने का झूठा मुकदमा (दाऊदनगर थाना काण्ड संख्या 217/2009) दर्ज करा दिया गया तथा प्रथम अपीलीय पदाधिकारी द्वारा मेरे आवेदन को अस्वीकृत कर दिया गया ।
इन सब से कुछ हो न हो एक बात तो अवश्य हुआ है कि ग्राम पंचायत अरई में कोई भी पदाधिकारी गलत कार्य करने से पहले सौ बार सोचने लगे हैं । और जो गलत करेंगे मैं उन्हें छोड़नेवाला भी नहीं हूँ चाहे वे कोई भी हों । अगर लोग सारी घटनाओं पर पैनी निगाह रखें तो महसूस करेंगे कि ग्राम पंचायत अरई के विकास राशि का दुरुपयोग करनेवाले पदाधिकारी एक-एक कर जेल यात्रा कर रहे हैं, बाकि लोग भी करेंगे और यह सब संयोगमात्र नहीं बल्कि प्रायोजित है ।
Some related links-
http://www.groundreportindia.com/2009/11/getting-fake-fir-instead-of-information.html
http://www.groundreportindia.com/2009/11/report-on-rti-seminar-patna-bihar.html
http://www.rajnisharai.blogspot.com/
Rajnish Kumar.
शुक्रवार, 8 जनवरी 2010
ग्राम अरई तथा ग्राम बुलाकी बिगहा को जोड़नेवाली सड़क के पक्कीकरण के संबंध में ।
सेवा में, प्रधान सचिव, ग्रामीण कार्य विभाग, बिहार, पटना । -------------------------- जिला पदाधिकारी, औरंगाबाद (बिहार) । विषय- ग्राम अरई तथा ग्राम बुलाकी बिगहा को जोड़नेवाली सड़क के पक्कीकरण के संबंध में । महोदय, उपर्युक्त विषयक मुख्यमंत्री (बिहार) को समर्पित मेरा आवेदन, मुख्यमंत्री सचिवालय संदर्भ संख्या 1212891269 द्वारा पथ निर्माण विभाग को भेजा गया । पुनः उपसचिव, पथ निर्माण विभाग ने इस पत्र को पत्र संख्या- ज॰शि॰को॰-01-490/08 ज़ापांक 171 दिनांक 06/01/2009 द्वारा आपके कार्यालय को प्रेषित किया, जिसकी प्रतिलिपि मेरे पास भी भेजी गयी है । उक्त संबंध में मेरा आप सभी से सादर निवेदन है कि इस परियोजना को स्वीकृत कर तथा इसके लिए राशि उपलब्ध कराकर, सड़क का निर्माण कराया जाए । इसके लिए मैं आप सभी का आभारी रहूँगा । विश्वासी- श्रीकान्त शर्मा अध्यक्ष, जिला किसान सभा (जद-यू), औरंगाबाद ग्राम पोस्ट - अरई, प्रखण्ड- दाऊदनगर जिला- औरंगाबाद (बिहार), पिन-८२४११३ |
The INTERNET now has a personality. YOURS! See your Yahoo! Homepage.
सोमवार, 4 जनवरी 2010
मुख्यमंत्री जी को नरेगा के सफल कार्यान्वयन हेतु सुझाव
सादर अभिवादन,
अगर बिहार से मजदूरों के पलायन को रोकना है तो नरेगा के तहत रोजगार योजनाओं के सफल संचालन के लिए प्रतिबद्ध होना होगा । मजदूरों के लिए इतनी महत्वपूर्ण योजना शायद पहले कभी नहीं आई । इस योजना के सफल संचालन में सबसे बड़ी बाधा हमारे द्वारा चुने गये मुखिया एवं अन्य पंचायत प्रतिनिधि ही हैं और शायद मुख्य वजह सरकार से भय का अभाव है । योजनाएँ कागजों पर चलायी जाती हैं, जाली जॉब कार्ड पर मजदूरी का भुगतान लिया जाता है, गलत मस्टर रॉल सुपुर्द किया जाता है, और हर साल प्रत्येक पंचायत में ८-१० लाख रुपए का घोटाला किया जाता है । आप जन जागरण अभियान अरररिया के द्वारा किए गए सोशल ऑडिट की अगर जानकारी लें, तो वास्तविकता का पता चल जाएगा । मैं आशीष रंजन और कामायनी को व्यक्तिगत रुप से जानता हूँ और उनके पास नरेगा के सोशल ऑडिट के लिए एक व्यापक योजना है । अगर आप सही में नरेगा का सफल कार्यान्वयन चाहते हैं तो इनके द्वरा आयोजित सोशल ऑडिट की तरह ही प्रत्येक पंचायत में सोशल ऑडिट का आयोजन करा सकते हैं, और उसमें प्राप्त शिकायतों पर दण्डात्मक कार्रवाई की भी जरुरत है, ताकि भविष्य में कोई इस योजना को लूट योजना बनाने की हिमाकत ना करे । एक तरफ बिहारी मजदूर दूसरे राज्यों में मानसिक, शारीरिक तथा आर्थिक शोषण के शिकार हो रहे हैं तो दूसरी तरफ हमारे द्वारा ही चुने गए पंचायत प्रतिनिधि तथा संबद्ध पदाधिकारी मिलकर नरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना की ऐसी की तैसी कर रहे हैं । मैं आशीष एवं कामायनी के हिम्मत एवं पहल की दाद देता हूँ ।
विश्वासी-
रजनीश कुमार
www.rajnisharai.blogspot.com
http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_6004372.html
मंगलवार, 29 दिसंबर 2009
मिट्टी की खुशबू ने विदेश से किया मोहभंग

कटिहार, [अमरेंद्र कांत]।
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता बन जाएगा। बशीर बद्र के शेर को चरितार्थ कर रहे हैं कामायिनी व उनके पति आशीष। अदम्य् साहस और दूसरों के लिए जीने की उत्कंठा लिए अमेरिका से नौकरी छोड़ कोसी व सीमाचंल में मजदूरों, शोषितों के बीच अलख जगा रहे इस दंपति को सरकारी सहायता के प्रति रुचि नहीं है।
ये चाहते हैं कि उनके द्वारा चलाए जा रहे अभियान से बिहार के मजदूरों, दलितों के चेहरे पर भी मुस्कान आए और वो भी अपने अधिकार का प्रयोग कर सकें। उत्तरप्रदेश के मेरठ की रहने वाली कामायनी स्वामी और सहरसा जिले के सोनबरसा के रहने वाले आशीष रंजन पति-पत्नी हैं।
आशीष रंजन आईआईटी खड़गपुर से बी टेक कर अमेरिका की एक कंपनी में कार्यरत थे, जबकि उनकी पत्नी दिल्ली के लेडी राम कालेज से एमए हैं। इसके अलावा टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल सांइस मुंबई की स्टूडेंट रही हैं।
कटिहार के मनसाही प्रखंड के गांवों में नरेगा, सूचना अधिकार, सरकारी योजना आदि को लेकर जनजागरण अभियान चलाने पहुंची कामायनी ने बताया कि वो वर्ष 1996 में मजदूर किसान शक्ति संगठन, श्रमिक आदिवासी संगठन मध्य प्रदेश से जुड़कर समाज सेवा कर रही थीं।
वर्ष 2003 में शादी के बाद अपने पति के साथ अमेरिका चली गई। लेकिन, ससुराल बिहार के सुदूर इलाके में रहने और वहां का रहन-सहन देखने के बाद उन्हें जागरूक बनाने के लिए उत्कंठा पैदा हुई और पति के साथ वर्ष 2005 में अमेरिका की नौकरी छोड़कर बिहार लौट आई।
बताया कि अररिया जिले से उसने इस अभियान की शुरुआत की और इसमें काफी सफलता मिली। दंपति अररिया समेत सीमांचल व कोसी के इलाके में जनजागरण अभियान के माध्यम से लोगों को उनके अधिकार, सरकार द्वारा प्रदत्त सुविधा के बारे में जानकारी देकर उन्हें आगे आने को कहते हैं।
इनके इस अभियान का नतीजा हुआ कि पिछले दिनों कटिहार जिले के मनसाही के लोगों ने प्रखंड कार्यालय पर जाब कार्ड बनाने व अधिकार के लिए धरना दिया और उन्हें अधिकारियों द्वारा कार्यवाई का आश्वासन भी मिला।
आशीष जो बीआईटी पटना में क्लास लेते हैं, उन्होंने बताया कि नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेघा पाटेकर एवं अन्य लोगों की अदम्य साहस को देखकर पत्नी का साथ देने विदेश की नौकरी को तिलांजलि देकर यहां पहुंचे हैं।
उनकी मंशा है कि कोसी व सीमांचल का इलाका ही नही वरन बिहार के लोगों की तरक्की हो सके। दबे-कुचलों को भी उनका अधिकार मिल सके। उन्होंने बताया कि इसमे उन्हें अन्य संगठनों का भी सहयोग मिल रहा है। युवा दंपति के इस जज्बे को सभी सलाम कर रहे हैं।
सोमवार, 21 दिसंबर 2009
हाथ तो ऐसे जोड़े हैं, जैसे नोबेल प्राइज लेकर स्वदेश लौटे हैं ।

चंडीगढ़। सीबीआई की एक विशेष कोर्ट ने उन्नीस साल पहले एक किशोरी से छेड़छाड़ करने के मामले में हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर को दोषी करार देते हुए छह माह के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही उन्हें 1,000 रुपए की राशि जुर्माने के रूप में भरने को कहा है।
सीबीआई के स्पेशल मजिस्ट्रेट जेएस सिद्धू ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि जुर्माना न अदा करने पर राठौर को एक माह की सजा और भुगतनी होगी। पीड़िता 14 वर्षीय किशोरी रुचिका गिरहोत्रा उभरती हुई टेनिस खिलाड़ी थी। वह 12 अगस्त 1990 को राठौर की छेड़छाड़ का शिकार हुई थी। उस दौरान राठौर हरियाणा में आईजी और हरियाणा टेनिस एसोसिएशन के अध्यक्ष थे। उसी दौरान रुचिका और राठौर का आमना-सामना हुआ था। इस घटना के तीन साल बाद रुचिका ने जहर पीकर खुदकुशी कर ली थी।
पूर्व डीजीपी की पैरवी कर रही उनकी वकील पत्नी ने अदालत से फैसला सुनाते वक्त उनकी उम्र और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए नरमी बरते जाने का अनुरोध किया था।
पीड़िता के परिजनों ने राठौर को सुनाई गई छह माह के सश्रम कारावास की सजा को कम बताया है। आईपीसी की धारा 354 के तहत दोषी करार दिए गए व्यक्ति को दो साल तक की कैद की सजा सुनाई जा सकती है।
गौरतलब है कि छेड़छाड़ की इस घटना के आठ साल बाद 1998 में इस मामले की जांच सीबीआई के हवाले की गई थी। रुचिका के परिजनों ने राठौर के खिलाफ केस किए जाने की वजह से पुलिस द्वारा उन्हें प्रताड़ित किए जाने का आरोप भी लगाया।
रुचिका की सहेली आराधना को राहत : रुचिका की सहेली और इस घटना की एकमात्र गवाह आराधना गुप्ता इस मामले का फैसला सुनने के लिए आस्ट्रेलिया से अपने पति के साथ चंडीगढ़ आई थीं। आराधना, रुचिका की सहयोगी टेनिस खिलाड़ी और पड़ोसी थीं। घटना के वक्त वह महज 13 साल की थीं। आराधना ने बताया कि रुचिका द्वारा खुदकुशी कर लिए जाने के कारण वह खुद को माफ नहीं कर पा रहीं थीं, लेकिन कोर्ट के फैसले से उन्हें कुछ राहत महसूस हुई है।
रुचिका की मौत के बाद पुलिस की प्रताड़ना से परेशान होकर उसका परिवार पंचकुला का अपना घर छोड़कर पंजाब में किसी अज्ञात जगह पर रहने चला गया था। इसके बाद रुचिका के मामले को आराधना के पिता ने अपने हाथ में ले लिया था और वे न्याय पाने के लिए लगभग 450 बार विभिन्न कोर्टे में पेश हुए थे।
शनिवार, 19 दिसंबर 2009
देश हित
अपने कर्म से विमुख ना हो, तुम पर है यह गुरुत्तर भार ।
विश्व में फिर छा जाएँ हम, प्रकट करे विश्व आभार,
यह संभव हो सकता है, जब दूर करें हम भ्रष्टाचार ।।
मंगलवार, 15 दिसंबर 2009
Fw: नरेगा के कार्यों में बरती जा रही अनियमितता की जांच कराने हेतु ।
|
The INTERNET now has a personality. YOURS! See your Yahoo! Homepage.
शुक्रवार, 27 नवंबर 2009
संवाददाता बंधु, जरा इस पुरानी खबर को ध्यान से पढिए और मेरी टिप्पणी भी ।
सड़क निर्माण : जनता की शिकायतों को जांच एजेंसी ने बताया गलत
Nov 27, 07:38 pm
दाउदनगर (औरंगाबाद) ठाकुर बिगहा कनाप सड़क इसी महीने बन कर तैयार हो जाएगी। लगभग दो करोड़ रूपये से बनने वाली दस किमी लंबी यह सड़क गत दिनों गुणवत्ता की शिकायत को ले ग्रामीणों द्वारा तोडे़ जाने के बाद चर्चा में आयी थी। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत निर्माणधीन इस सड़क की गुणवत्ता पर ग्रामीणों ने सवाल उठाया था। कई सक्षम संस्थानों को जांच के लिए लिखा गया था। निर्मात्री एजेंसी इरकान ने इसे बनाने का ठेका लोकल एजेंसी को दे रखा है। ठेकेदार कौशल किशोर सिंह ने इस बात की पुष्टि की है कि केन्द्रीय जांच कमिटी ने जांच के बाद ग्रामीणों के आरोप को खारिज कर दिया है। तीस सदस्यीय कमेटि ने जांच किया था अब प्रशासनिक देखरेख में इस सड़क का निर्माण हो रहा है। गुणवत्ता नियंत्रण और इरकान वाले भी तैनात रहते हैं। श्री सिंह ने दावा किया कि एक ग्रामीण पैसे की मांग को लेकर डटा था, नहीं देने पर उसने तमाम जगहों पर शिकायत की, जबकि काम गुणवत्ता पूर्ण कराया जा रहा था। जांच कमेटी ने पचास-पचास फीट पर सड़क खोदकर जांच किया। दूसरी ओर जांच रिपोर्ट से ग्रामीण संतुष्ट नहीं है।
मेरी टिप्पणी-
सबसे पहले तो मैं बता दूँ, कि जिस ग्रामीण पर पैसे माँगने का आरोप लगाया गया वह मैं ही हूँ । वास्तव में मैंने तमाम जगहों पर शिकायत पहुँचाई पर उसका एकमात्र उद्देश्य प्राक्कलन के अनुसार काम करवाना था । और मैं इसमें सफल रहा । दैनिक जागरण के संवाददाता भी इस मामले में अच्छी रिपोर्टिंग नहीं किए । कोई चुटका पर लिखकर कुछ दे दे और उसको आप खबर बना दें, यह जिम्मेवार संवाददाता का काम नहीं । आपको यह ध्यान में रखना चाहिए कि अखबारों की पहुँच घर-घर में होती है और उसके आधार पर लोग एक धारणा बना लेते हैं । आपकी खबरों को लोग सही समझ कर पढ़ते है । सबसे पहले तो इसका प्राक्कलन लगभग दो करोड़ नहीं बल्कि आठ करोड़ बाईस लाख रुपये थी । फिर ग्रामीण विकास मंत्रालय से जो लेटर मेरे पास आया है उसमें तो यह लिखा गया है कि शिकायत पर जब जाँच हुई तो घटिया स्तर के मैटेरियल के उपयोग की बात सामने आयी । इतना ही नहीं उन्होने संबंधित एजेंसी को तुरंत निवारक कार्रवाई करने हेतु स्पष्ट निर्देश भी दिया है । कोई भी व्यक्ति चाहें तो वह लेटर मुझसे संपर्क कर देख सकते हैं । रही बात पैसे माँगने के आरोप के बारे में तो मैं यह महसूस कर रहा हूँ कि जहाँ भी मैं गलत कार्यों का विरोध कर रहा हूँ, चट से लेवी माँगने, रंगदारी माँगने, पैसे छिनने इत्यादि का आरोप लगा कर थाने में प्राथमिकी दर्ज करने का आवेदन दे दिया जाता है । पत्रकार महोदय आप पर देश की भविष्य टिकी है, कम से कम आप तो वास्तविकताओं से अवगत होकर खबर प्रकाशित करें । मैं आपसे अपनी छवि बनाने हेतु यह नहीं कह रहा, अगर मैं इसकी चिन्ता करने लगा तो शायद कुछ न कर पाऊँ । बल्कि इसलिए कह रहा हूँ कि ऐसी खबरों से भ्रष्टाचारियों को बल मिलता है और बाकि लोग विरोध करने से कतराते हैं ।
मंगलवार, 24 नवंबर 2009
भूखी लाश की आवाज़

चुनने के बाद न जाने किस खता पर
वो इस कदर नाराज हुएं
की हमारी भूख भरी चीखें
उनके कानों में बे-असर ,बे-आवाज़ हुएं।
आज एक बेबस चल बसा
एक गरीब खामोश हुआ
आज उन्होंने संसद नही चलने दी
क्योंकि उन्हें इसका अफ़सोस हुआ।
हम ता-उम्र नंगे खड़े रहे उनके दर पर
पर वो हमारी बदहाली से आज जाने जायेंगे
मैं भूखा मरा लेकिन मेरी लाश
पर कल कई कमाने आयेंगे।
ये जीवन फाकों में गुजरा
फाकों में ही अस्त हुआ
पर मैं खुश हूँ की मेरे मरने से
कईओं की रोजी-रोटी का बन्दों-बस्त हुआ।
हालांकि अफ़सोस यह है की निवाले हमारे
अब भी सेहत -मंदों की तिजोरियों में बंद है
गरीब कल भी कल की रोटी के लिए फिक्र-मंद था
आज भी कल की रोटी के लिए फिक्र-मंद है।
-अभिनव शंकर 'अनिकुल'
http://aneekul.blogspot.com/
इनका घर कब बनेगा ?

मेरे गाँव में इन्दिरा आवास योजना अंतर्गत १२१ लाभार्थियों का चयन हुआ है । लगभग २५ ऐसे हैं, जिनके पास पहले से अपना पक्का मकान है अथवा जिनके परिवार के सदस्यों के नाम पर इन्दिरा आवास का एक नहीं दो-दो बार आवंटन हो चुका है । कुछ लोग तो ऐसे हैं, जिनके पास पक्का का मकान तो है ही, खेती-बारी की अच्छी जमीन भी है और संपन्न हैं । मैं खुलकर कहूँ तो मेरी जाति (भूमिहार) से ही दो लोगों का नाम लाभार्थियों की सूचि में है, वे बिल्कुल अयोग्य पात्र हैं । एक भाजपा के छुटभैये नेता हैं, दिनभर कोई काम नहीं, मुखिया जी के लटक, इस पदधिकारी से उस पदाधिकारी तक केवल जान-पहचान के लिए दौड़ लगाना, कोई मंत्री रास्ते से गुजर रहे हों तो घंटों रोड पर माला लेकर खड़ा रहना, फिर जनता से आय-आवासीय बनवाने के लिए ५० रु॰ तसीलना और अभिनन्दन समारोह आयोजित करना इनकी दैनन्दिनी है । इन महाशय के तीनों पुश्त का नाम बीपीएल सूचि में है, दो इन्दिरा आवास पहले ले चुके हैं तीसरे का पैसा जल्दी ही मिलनेवाला है । मूरख जनता, इन्दिरा आवास के लिए पाँच-पाँच हजार रुपए मुखिया जी के पास जमा कर रही है । मुखिया जी कोई शपथ-पत्र अपने पास जमा करा रहे हैं और लाभार्थियों को हड़का रहे हैं कि पैसा नहीं देने पर आपका शपथ-पत्र नहीं लेंगे और आप लाभार्थियों की सूची में रहने के बावजूद, लाभ से वंचित कर दिए जाओगे । मैंने बीडीओ साहब से शिकायत की (बाकायदा वैसे लोगों का नाम दिया जो या तो पूर्व में इस योजना का लाभ उठा चुके हैं या जिनका पक्का का मकान है तथा जाँच में सहयोग करने का वादा भी किया), उन्होने जाँच के आदेश भी दे दिए हैं । इधर सुनने में आ रहा है कि अनुसंधान पदाधिकारी ने लाभार्थियों से संपर्क साधा, कुछ लेन-देन की बातें हुई तथा एक-दो को छोड़कर बाकि लोगों के मकान की हालत जर्जर बता दी । अब इसका क्या उपाय है ? बात तो वही हो गयी- "बिल्ली को दूध की रखवाली मिल गयी" । मैंने इस बारे में शिकायत की तो कुछ लोगों ने कहना शुरु किया कि यह ग्रामीण राजनीति है । कुछ ने कहा यह पुरब-पश्चिम की लड़ाई है, जिसके चलते शिकायत की गई । भैया न तो मैं राजनीति कर रहा हूँ और न ही पुरब-पश्चिम के चक्कर में हूँ । ये बातें तो धूर्त लोग हवा में उछाल देते हैं अपनी रोटी सेंकने के लिए, जबतक आप पूरी बात समझेंगे तबतक वे अपनी रोटी सेंक चुके होंगे । मेरी जो शिकायत है उसे आप देखें तो पायेंगे कि यह हूबहू सही है, और पता है यह किनका हक मारा गया है । चलिए मेरे साथ देवी बिगहा, उमेर बिगहा तथा ठाकुर बिगहा -
यहाँ न तो नली-गली बनाया गया, न बीआरजीएफ का पैसा लगाया गया, न इन्हें नरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध कराया गया और न अभी तक इन्दिरा आवास उपलब्ध कराया गया । इनके घर माटी के बने हैं, प्रत्येक वर्ष एक-दो लोगों की मौत साँप काटने से हो जाती है और घर को घर नहीं कहा जा सकता । बरसात में तो इनके घर अब गिरे कि तब गिरे वाली हालत में होती है । बाहर गली से लेकर घर तक कीचड़ का अंबार लगा होता है । मेरे अंदर भी जातीय भावनाएँ हैं, पर इनकी हालत देखता हूँ तो मेरा मन रोने को करता है, और विवश हो जाता हूँ इनके लिए कुछ करने को और फिर जात-परजात की बात खतम हो जाती है । वास्तव में यह मैं किसी राजनीति के तहत नहीं कर रहा बल्कि लगता है कि इनके पास जानकारी का अभाव है जिसके चलते इन्हें ठगा जा रहा है, तो मुझसे जितना बन पाए उतना करने की तो कोशिश करूँ । ये दिन-रात मेहनत करते हैं, इनकी मेहनत की कमाई हम खाते हैं, पर उनके खाने की गारंटी नहीं होती । ऊपर से इनके कल्याण के लिए चलायी जा रही सरकारी योजनाओं को भी हमलोग ही हड़प लें, तो यह महापाप है और सारे फसादों का जड़ भी । एक साजिश के तहत इन्हें बीपीएल सर्वे के समय अपेक्षाकृत कम गरीबों की सूची में रखा गया अथवा सर्वे में अंकों का ऐसा दाँव-पेंच लगाया गया कि इनके हिस्से का लाभ स्थानीय मुखिया के चहेतों को मिल सके, चाहे वे गरीब न भी हों । मैं किसी विचारधारा से भी प्रभावित नहीं हूँ बल्कि यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है । हो सकता है, इसके चलते भी मुझपर कोई नई प्राथमिकी दर्ज हो जाए पर इससे सच्चाई पर तो पर्दा नहीं डाला जा सकता ।
रजनीश कुमार
ग्राम-अरई, जिला-औरंगाबाद,
राज्य-बिहार, पिन-८२४११३
सोमवार, 23 नवंबर 2009
नीतीश ने सूचना नियम बदले, अख़बारों ने ख़बर गोल की
ध्यान रहे कि वर्ष 2005 में संसद द्वारा सूचना क़ानून पारित किये जाने से पहले ही नौ राज्य सरकारों ने सूचना क़ानून लागू कर दिये थे। तमिलनाडु एवं गोवा में 1997, राजस्थान एवं कर्नाटक में 2000, दिल्ली में 2001 में यह क़ानून बना। असम, मध्यप्रदेश एवं महाराष्ट्र ने 2002 तथा जम्मू-कश्मीर ने 2004 में सूचना क़ानून बनाया। इनमें से एक भी राज्य एनडीए के किसी घटक या भाजपा-जदयू शासित नहीं था। इन नौ राज्यों में और फिर केंद्रीय स्तर पर भी सूचना क़ानून लाने का श्रेय कांग्रेस और यूपीए से जुड़े दलों को जाता है। अब कांग्रेस को सूचना क़ानून बनाने का अफ़सोस है क्योंकि इस क़ानून से पहली बार लोकतंत्र के बेचारे नागरिक को एक हैसियत मिल गयी है। वह शासन-प्रशासन की असलियत उजागर करने लगा है। इसीलिए केंद्र सरकार ने सूचना क़ानून में संशोधन करके इसे कमज़ोर करने की कोशिशें शुरू कर दी है।
दूसरी ओर, बिहार सरकार ने एक कदम आगे बढ़ कर फीस नियमों में अवैधानिक संशोधन किये हैं। इससे पता चलता है कि नागरिकों को सूचना के अधिकार से वंचित करने में आज यूपीए और एनडीए, दोनों में सहमति बन चुकी है।
17 नवंबर 2009 को पटना में बिहार सरकार के मंत्रिपरिषद की बैठक हुई। बैठक में सूचना का अधिकार संबंधी फीस नियमावली के संशोधन को स्वीकृति दी गयी। इसके अनुसार अब आवेदक को एक आवेदन पर एक ही सूचना उपलब्ध करायी जा सकेगी। आवेदक को सूचना पाने के लिए अपना टिकट लगा एवं पता लिखा लिफाफा भी देना होगा। इसके अलावा बीपीएल सूची में शामिल लोगों को अब दस पेज तक की ही सूचना नि:शुल्क दी जाएगी।
यह संशोधन पूर्णतया अवैध है। यह सूचना मांगने वाले नागरिकों को परेशान करने की बुरी नीयत से किया गया है। यह सूचना क़ानून के प्रावधानों और भावना के ख़िलाफ़ है। बिहार और देश की जनता इसे कदापि स्वीकार नहीं करेगी। सुशासन और विकास पुरुष की श्रेणी में नाम लिखाने की कोशिश में जुटे नीतीश कुमार को पारदर्शिता विरोधी इस संशोधन के कारण विदूषकों की सूची में अपना उल्लेख देखने की नौबत आ सकती है।
सूचना क़ानून के तहत फीस एवं अपील संबंधी नियमावली बनाने का अधिकार राज्य सरकारों को दिया गया है। लेकिन यह मूल क़ानून के अनुरूप ही होनी चाहिए, न कि इससे प्रतिकूल। कोई भी नियम उसके मूल क़ानून से ऊपर या उसके प्रतिगामी नहीं हो सकता। फिर, जब क़ानून और नियम में विरोधाभास हो, तो क़ानून को ही सर्वोपरि माना जाएगा।
सूचना क़ानून की धारा 7(5) कहती है – ऐसे व्यक्तियों से, जो गरीबी की रेखा के नीचे हैं, कोई फीस प्रभारित नहीं की जाएगी।
मतलब साफ है। क़ानून के अनुसार बीपीएल श्रेणी के नागरिकों से सूचना के एवज़ में कोई फीस नहीं ली जाएगी। वह सूचना अधिकतम कितने पृष्ठों तक होगी, क़ानून ने इसकी कोई सीमा तय नहीं की है। लिहाजा, बिहार सरकार द्वारा बीपीएल श्रेणी के लोगों को दस पेज तक की ही सूचना निःशुल्क देने संबंधी नियम बनाया जाना अवैध है। यह सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के प्रावधानों और भावनाओं के प्रतिकूल है। अदालत में इसे चुनौती देकर न्याय की अपेक्षा की जानी चाहिए।
इसी तरह, एक आवेदन में सिर्फ एक सूचना मांगने संबंधी नियम भी अवैध एवं हास्यास्पद है। सूचना क़ानून के अनुसार सूचना के लिए नागरिक एक लिखित आवेदन देगा। इसमें सूचना की परिभाषा काफी व्यापक एवं विस्तृत है। इसमें आवेदन को मात्र किसी एक सूचना या किसी एक बिंदु तक सीमित करने का कोई प्रावधान नहीं है। लिहाज़ा, कोई भी सरकार अपनी मरजी से सूचना की परिभाषा को संकुचित नहीं कर सकती। यह संशोधन बिहार को सुशासन नहीं बल्कि कुशासन की ओर ले जाएगा। नौकरशाह इस संशोधन की मनमानी व्याख्या करके नागरिकों को अपमानित और प्रताड़ित करेंगे।
सूचना के एवज़ में फीस लेने का प्रावधान है। लेकिन क़ानून में यह बात स्पष्ट कही गयी है कि यह फीस युक्तियुक्त या तर्कसंगत होनी चाहिए। अनुचित या अतार्किक फीस वसूलने की कोशिश अवैध मानी जाएगी।
क़ानून की धारा 27 में राज्य सरकार को नियम बनाने की शक्ति दी गयी है। इसमें फीस संबंधी नियम सिर्फ सूचना के लिए आवेदन करने और सूचना के प्रति पृष्ठों के संबंध में लेने की बात कही गयी है। सूचना नहीं मिलने या अधूरी मिलने पर अगर आवेदक को अपील करनी हो, तो इसके लिए कोई फीस नहीं ली जा सकती। प्रथम अपील के संबंध में राज्य सरकार को सिर्फ प्रक्रिया संबंधी नियम बनाने की शक्ति है। इसके लिए वह कोई फीस निर्धारित नहीं कर सकती।
लेकिन बिहार सरकार ने प्रथम अपील के लिए पचास रुपये की फीस निर्धारित करके सूचना क़ानून का मखौल उड़ाया है। जरा सोचिए, किसी नागरिक को अपील क्यों करनी पड़ रही है? जनसूचना अधिकारी ने उसे वांछित सूचना नहीं दी, इसलिए नागरिक को अपील करनी पड़ रही है। अगर उसे सूचना मिल गयी होती तो अपील नहीं करनी पड़ती। इस तरह, जनसूचना अधिकारी द्वारा क़ानून का पालन नहीं किये जाने के कारण नागरिक को प्रथम अपील करनी पड़ी। ऐसे में उस नागरिक को संरक्षण और सहयोग देने के बजाय उससे पचास रुपये वसूलना निश्चय ही उसे हताश करने की साजिश है।
डॉ जगन्नाथ और लालू प्रसाद जैसे प्रतापी नेता पशुपालन घोटाले की चक्की में पिस गये। मधु कोड़ा जैसे सौभाग्यशाली मुख्यमंत्री मिनटों में उठाईगीर साबित हो गये। सुशासन लाना हंसी-ठठ्ठा नहीं है नीतीश जी। देखते-ही-देखते दिन लद जाएंगे। सुशासन का ठेका अकेले मत लीजिए। नहीं सकिएगा। भ्रष्टाचार रोकना हो तो बिहार के नागरिकों की मदद लीजिए। सुशासन चाहिए तो आम नागरिक की हैसियत को मत ललकारिए। उसे भी शासन और प्रशासन से जानने और पूछने दीजिए। उसे अवैध नियमों के जाल में मत उलझाइए। उन राज्यों का अनुसरण कीजिए, जो सूचना क़ानून को सरल और जनमुखी बना रहे हैं। महाराष्ट्र से ही कुछ सीख लीजिए। पुणे नगरपालिका में हर सोमवार को कोई भी नागरिक जाकर कोई भी फाइल देख सकता है। उसकी फोटो कॉपी ले सकता है। महाराष्ट्र ज़्यादा दूर लगे तो आप पड़ोसी राज्य झारखंड के एक युवा आइएएस का उदाहरण देख लीजिए। रांची के उपायुक्त केके सोन अपने विभागों की तमाम सूचनाएं सहर्ष देने को तत्पर रहते हैं। उन्हें तो कोई डर नहीं है सूचना क़ानून से।
अगर आपको अकर्मण्यता और लूटखसोट के उजागर होने का भय नहीं, तो सूचना क़ानून से डरने की ज़रूरत नहीं। नागरिक तो अपने सवालों से आपके सुशासन के रथ को आगे बढ़ाने में ही मदद कर रहे होंगे। अगर आपके पास छुपाने को कुछ नहीं, तो सूचना क़ानून से भय कैसा? यह क़ानून तो पूरे देश में शासन और प्रशासन को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में ऐतिहासिक और शानदार सफलताएं हासिल कर रहा है। फुरसत हो तो इन सफलताओं के किस्से पढ़-सुन लें। क़ानून की धारा चार के सभी प्रावधानों का सही अनुपालन हो तो आपकी समस्याएं यूं ही आधी हो जाएंगी। आप जिस सुशासन की बात करते हैं, वह सूचना क़ानून से ही आएगा। वह सुशासन हर नागरिक की सक्रियता से ही आ सकता है। अगर आपके राज्य में सूचना क़ानून की हत्या हुई, तो कुशासन लाकर सुशासन की बात करने वाले विदूषक कहलाने में देर नहीं लगेगी।
Original post by Sri Vishnu Rajgadiya on www.mohallalive.com
शनिवार, 21 नवंबर 2009
DIG Installs Jahangiri Bell in Bihar



Saturday, August 9th 2008
Patna. For a change, Bihar police has got a different image in Muzaffarur thanks to the efforts of 1988 batch IPS Arvind Pandey, DIG of Tirhut range. Pandey has got a “Jahangiri Bell” installed outside his official bungalow at Muzaffarour. It has been installed on the pattern of a similar bell placed outside the palace by Mughal Emperor Jahangir.
Pandey , who is available on both mobile and landline numbers, has got the Jahangiri Bell (he has written the Jahangiri bell on his bungalow walls too) installed to facilitate the common man, who has no cellular phone or land line connection to contact him. Anyone with any grievance has to simply pull the bell, the DIG will come out of his bungalow. If he is out of station, his staff comes out and attends to the common man after hearing the sounds of the bell.
Son of a priest of the famous Vindhyachal temple in Uttar Pradesh, Arvind Pandey has earned image of a social reformer in Bihar. He has launched the Bihar Mukti Andolan ,which advices people to ignore minor conflicts, settle disputes through mutual negotiations and shun violence.
Pandey claims that the Andolan was a cultural movement to organize the disgruntled youths to constructive activities. Through the Andolan, the DIG helps out of court settlements of disputes in his range. Over 3,000 disputes were settled in one year through the Andolan, giving relief to the litigants from appearances in the courts, attending to the investigations in the police stations and saving money which is paid as fees to the advocates.
Pandey calls the litigants and their witnesses before Andolan Jan Adalat and after hearing them advises to settle their disputes amicably. According to Pandey 70 per cent of the disputes were related to poor families. Out of court settlements were great relief for these families
गुरुवार, 19 नवंबर 2009
"भूरा बाल साफ करो"



१९७४-७५ में जेपी आन्दोलन के तथाकथित नेता आज बिहार के नियामक बन गये हैं, वे आज नीति-निर्माता हैं तथा गरीबों, पिछड़ों और वंचितों के नायक बताए जा रहे हैं । यह सच है कि लालू, नीतीश और पासवान ने बिहार के राजनीतिक चेहरे को बदलने की कोशिश की है, पर इसका कोई बुनियादी असर हुआ नहीं दिखता । बिहार में सवर्ण राजनीति का दौर बीत चुका है । पिछड़ी, दलित और वंचित जातियाँ अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो गयी हैं । उनका राजनीतिक सशक्तिकरण हुआ है । निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ी है ।
लालू ने शायद बदलते दौर की नजाकत को समझते हुए ही सवर्णों को गरियाना शुरु किया था और कुर्सी की अंधी दौड़ में सफल भी हुए । मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने के बाद तो उन्होने जातीय उन्माद फैलानेवाले भाषणों की झड़ी लगा दी । उस दौर में "भूरा बाल साफ करो" लालू जी का हमवाक्य हो गया था । मुझे लगता है कि बहुत सारे जातीय दंगे इनके भाषणों के कारण ही हुए । कुछ जातियों के बीच इतनी कटुता भर गयी कि उनमें संवादहीनता की स्थिति आ गयी और वे अकारण एक-दूसरे को दुश्मनी के भाव से देखने लगे, कभी-कभी तो उसका असर आज भी दिखता है । ये जेपी क्रान्ति के उपज हैं ।
रामविलास पासवान का आचरण सर्वविदित है । एक वोट की खातिर देश पर लोकसभा का चुनाव थोपा और घोर आश्चर्य कि चुनाव बाद जिसके विरुद्ध वोटिंग किया उन्हीं के साथ हो लिए । इन्हें देशहित नहीं, अपने मंत्रीपद की परवाह थी। दलित राजनीति करते हैं, पर शौक पुराने महाराजाओं से भी बड़े-बड़े रखते हैं । "सामंत" एवं "सामंती प्रवृति" शब्द का बार-बार उल्लेख करते थे । विदित हो कि इन दोनों शब्दों का प्रयोग तथाकथित समाजवादी नेता कमोवेश सवर्णों को गाली देने के लिए अपनी सुविधानुसार करते रहते हैं ।
नीतीश कुमार बिहार के विकास के नाम पर सत्ता में आए | चार साल में इन्होने काफी मेहनत भी की, पर इनमें भी व्यापक दृष्टिकोण का अभाव है, इनका आचरण कतई लोकतांत्रिक नहीं है । वे दोहरे चरित्र के मालिक हैं, खुद को अच्छे छवि के रुप में पेश कर, अपने दल में चोर-उचक्कों की फौज खड़ी कर ली है । भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में असफल रहे, जिससे कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा हो गया है । अपने साथी मंत्रियों को पद तो दिया, पर अधिकार से वंचित रखा । लोकसभा चुनावों के पूर्व विकास के नाम पर जनता की भावना जबर्दस्त रुप से नीतीश के पक्ष में बनी, जिसका अपमान नीतीश कुमार ने महाबली सिंह तथा कई ऐसे ही मौकापरस्त एवं अयोग्य व्यक्तियों को देश की सर्वोच्च नीति-निर्मात्री संस्था लोकसभा में भेजकर किया ।
क्या वाकई इन नेताओं की चिन्ता राज्य के विकास को लेकर है या विकास और सामाजिक न्याय का नारा सत्ता हथियाने का एक उपक्रम मात्र है ?
सोमवार, 16 नवंबर 2009
Fwd: Case No. 217/2009 Daudnagar PS (Aurangabad)
From: Bihar Bhakti <bihaarbhakti@gmail.com>
Date: Mon, Nov 16, 2009 at 9:25 AM
Subject: Re: Case No. 217/2009 Daudnagar PS (Aurangabad)
To: Rajnish Kumar <rajnisharai@gmail.com>
Cc: dgp-bih@nic.in, sp-aurangabad-bih@nic.in, digmagadh-bih@nic.in, zonalig-patna-bih@nic.in, Nitish Kumar <cmbihar@bih.nic.in>, cmbihar@nic.in
सेवा में ,
श्री आनंद शंकर ,
पुलिस महानिदेशक ,
बिहार ,
महोदय ,
इस काण्ड में पुलिस अधीक्षक , औरंगाबाद ने मेरी सूचना पर तुंरत हस्तक्षेप करके ,एक नागरिक को गैरकानूनी तरीके से जेल भेजे जाने से बचाया ..
थाना स्तर पर आज भी वही हो रहा है जो सदा से होता आया है ..प्राथमिकी-उद्योग , पर्यवेक्षण-उद्योग और विशेषप्रतिवेदन-उद्योग पर तुंरत निवारक कारर्वाई की आवश्यकता है ..
अरविंद पाण्डेय ..
उप महानिरीक्षक ,
पटना .
Respected sir,
Yesterday, i was arrested by a police officer of Daudnagar Police Station in district Aurangabad (Bihar) in a fake case made by a most corrupt Bank Manager. As i had made complaints on various complaint forums about his corrupt activities and had filed an application seeking information under RTI. IO (Investigation Officer) Md. A.A.Khan was demanding some rupees for writing a good diary about me, i told him that "i am not going to give you a single rupeeas i havn't done any thin wrong with bank manager. Why he has not investigated the case till date nor supervised ? Thanks a lot to senior IPS Officer Sir. Arvind Pandey, who followed up the matter and after that i was released on bail otherwise they were sending me in jail. In fact, i am innocent in this case and i think, local police officers know the facts but they are delaying in investigation and supervision for malpractices. What type of policing this is ? I am not a criminal nor indulged in any type of illegal activities as my best knowledge.
I request you to please enquire the matter and do as needed.
With great regards-
Rajnish Kumar
S/O Dr. Krishna Nandan Sharma
Village & Post Arai,
Ps Daudnagar,
Dist. Aurangabad (Bihar0,
PIN 824113
Fwd: Case No. 217/2009 Daudnagar PS (Aurangabad)
From: Rajnish Kumar <rajnisharai@gmail.com>
Date: Sun, Nov 15, 2009 at 11:48 PM
Subject: Case No. 217/2009 Daudnagar PS (Aurangabad)
To: dgp-bih@nic.in, sp-aurangabad-bih@nic.in, digmagadh-bih@nic.in, zonalig-patna-bih@nic.in
Cc: bihaarbhakti@gmail.com, Nitish Kumar <cmbihar@bih.nic.in>, cmbihar@nic.in
Respected sir,
Yesterday, i was arrested by a police officer of Daudnagar Police Station in district Aurangabad (Bihar) in a fake case made by a most corrupt Bank Manager. As i had made complaints on various complaint forums about his corrupt activities and had filed an application seeking information under RTI. IO (Investigation Officer) Md. A.A.Khan was demanding some rupees for writing a good diary about me, i told him that "i am not going to give you a single rupees i hadn't done any thing wrong with bank manager. Why he has not investigated the case till date nor supervised ? Thanks a lot to senior IPS Officer Sir. Arvind Pandey, who followed up the matter and after that i was released on bail otherwise they were sending me in jail. In fact, i am innocent in this case and i think, local police officers know the facts but they are delaying in investigation and supervision for malpractices. What type of policing this is ? I am not a criminal nor indulged in any type of illegal activities as my best of knowledge.
I request you to please enquire the matter and do as needed.
With great regards-
Rajnish Kumar
S/O Dr. Krishna Nandan Sharma
Village & Post Arai,
Ps Daudnagar,
Dist. Aurangabad (Bihar0,
PIN 824113
सोमवार, 9 नवंबर 2009
क्या वे आज के लियोनार्दो द विंची हैं !

कल मैं पहली बार आई पी एस ऑफीसर श्री अरविन्द पाण्डेय जी से मिला, बहुत सुखद अनुभूति हुई । वे एक पुलिस ऑफीसर से बहुत आगे की चीज हैं । सबसे बड़ी बात तो ये है कि वे सपना देखते हैं, बिहार को सशक्त बनाने का सपना और समाज को जोड़ने का सपना । बात करने से पता चलता है कि उनके मन में बिहार को विकसित बनाने हेतु व्यग्रता है । व्यग्रता के साथ-साथ सतर्कता भी है, कोई व्यग्रता में गलत प्रतिक्रिया न दे इसकी हिदायत वे बार-बार देते हैं । इस मंदी और सूखे की चपेट में बिहारियों के कल्याण हेतु आए पैसे का सदुपयोग न होकर लौट जाना, टीस देनेवाला है । मैं क्या कोई भी थोड़ा समझ रखनेवाला आदमी उनसे बात करने के बाद बिना प्रभावित हुए नहीं रह सकता । नरेगा के बारे में कह रहे थे कि इसमें अगर मजदूरों को काम लगातार मिलता रहता तो इससे उनकी क्रय क्षमता बढती और स्थानीय स्तर पर जहाँ एक ओर खुदरा व्यापारियों को लाभ मिलता वहीं शहर में थोक व्यापारियों की भी चाँदी रहती, साथ में विक्रय शुल्क तथा अन्य सांविधानिक करों के माध्यम से राज्य सरकार की भी आमदनी बढ़ती । वे हाल में उजागर हुए मधु कोड़ा प्रकरण पर कह रहे थे, जनता भी बेमतलब के मुद्दों पर तो रेलगाड़ी जलाने पहुँच जाती है (जो मेरे विचार से देशद्रोह है) पर इन चार हजार करोड़ रुपये की वापसी के लिए कोई मुँह नहीं खोल रहा । वे इस बात के प्रति भी आगाह करते नजर आए कि कहीं बिहार में भी तो कोई मधु कोड़ा नहीं पल रहा । फर्जी मुकदमों को खत्म कराने के उनके प्रयास सर्वविदित हैं । वे किताबें लिखते हैं, कवितायें लिखते है, प्राणायाम तथा योगा करते हैं, इण्टरनेट पर भी बहुत सक्रिय हैं, संगीतकार हैं, गीतकार हैं, खुद गाते भी हैं, अभिनेता भी हैं और भी बहुत फन में माहिर,सामाजिक कार्यों में सक्रियता के मामले में शायद ही कोई उनका मुकाबला करे । क्या वे आज के लियोनार्दो द विंची हैं !



